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पितृसत्ता, नारीवाद और बहुजन महिलाएं

जूपाका सुभद्रा (Joopaka Subadra)

 

जूपाका सुभद्रा से बातचीत का यह (पहला) भाग भारत नास्तिका समाजम और साइंटिफिक स्टूडेंट्स फेडरेशन द्वारा आयोजित एक बातचीत में उन्होंने रखा था.

 

आज मैं जिस विषय पर बात करने जा रही हूँ, वह है ‘पितृसत्ता, नारीवाद और बहुजन महिलाएँ’! नारीवादियों के अनुसार, नारीवाद, महिलाओं और पुरुषों के बीच, समानता को लेकर है, और, समानता के लिए है. वे कहती हैं, सभी महिलाएं समान हैं, और यह कि हमारे बीच कोई मतभेद नहीं हैं, हमारे बीच कोई दीवारें नहीं हैं. हम सभी पितृसत्ता का सामना करते हैं. और यह कि पितृसत्ता सभी के लिए समान है. बहुजन महिलाएं, एमबीसी महिलाएं, आदिवासी महिलाएं, दलित महिलाएं उनकी इस दलील से असहमत हैं. क्योंकि उनकी समस्याएं समान नहीं हैं. इन जातियों और जनजातियों में पितृसत्ता एक जैसी नहीं है. ये अलग अलग प्रकार की होती है. उनकी पितृसत्ता हमसे अलग है. वे श्रम के बाहर मौजूद हैं, हम श्रम के अंदर रहते हैं.

 

अगर स्त्री-पुरुष समानता की बात करें, तो जाति के सर्वनाश के बिना यह कैसे संभव हो सकता है? स्त्री-पुरुष समानता, अन्य दर्जेबंदियाँ(हाइरार्की) तभी ख़त्म होंगी जब जाति का विनाश हो. लेकिन अगर आप केवल पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता के बारे में बात कर रहे हैं, तो सवाल उठता है: आप किन पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता की बात कर रहे हैं? हम जो समान रिश्तों में हैं, श्रम की शक्ति के रूप में (दलित, आदिवासी, एमबीसी महिलाएं) श्रमिक महिलाएं हैं, पसीने बहाने वाली महिलाएं हैं.

 

इन श्रमिक महिलाओं के मुद्दों को नारीवादियों के साहित्य में कभी नहीं देखा जाता है, उनके कार्यक्रमों में कभी नहीं देखा जाता है. लेकिन वे कहते हैं कि सभी महिलाएं समान हैं. लेकिन ये किसकी समस्याएँ हैं, और मुद्दे हैं, जो इन नारीवादियों का एजेंडा बन जाते हैं? हमारे मैला ढोने की समस्या, स्वच्छता महिला कार्यकर्ता? हमारी जोगिनी महिलाओं की समस्याएं? हमारी शिक्षा की कमी, बेरोजगारी की समस्याएँ? हमारे लिए गरिमा के इनकार की समस्याएं?… लेकिन हमारी समस्याओं को उनके लेखन या साहित्य या कार्यक्रमों में जगह नहीं मिलती है.

 

लेकिन फिर, वे कहती हैं कि सभी महिलाएं एक हैं. हाल ही में, विनोदिनी मधुसु* ने एक बहुत अच्छा अवलोकन किया: जाति दर्जेबंदी(हाइरार्की) में, महिलाएं कौन सी पायदान पर हैं? ब्राह्मण महिलाएँ ब्राह्मण पायदान पर हैं. और क्षत्रिय और वैश्य और शूद्र अपने खेमे में हैं..और दलित, वे तो बिलकुल नीचे हैं, पाताल में. तो इस सामाजिक क्रम में ये सभी महिलाएँ किस पायदान पर हैं?

 

उधर, वे महिलाएं जिनके पेट बिना दहलीज पार किए ही भर जाते हैं. लेकिन इधर हमारी महिलाएं श्रम में लगी हुई हैं. उधर, उनके लिए, यौन स्वतंत्रता, पारिवारिक सम्मान (वे कैसे प्रासंगिक हैं) .. वे कहते हैं, परिवार! परिवार में, उनकी पितृसत्ता उन्हें जायदाद की रक्षा, वंश को बढ़ाने और बच्चों को जन्म देने जैसे कर्तव्यों का निर्वाह करने को कहती है.

 

हमारे यहाँ, मज़दूर जातियों में कहाँ है जायदाद? हमारी जातियों में महिलाएं न केवल बच्चे पैदा करती हैं, बल्कि वे सामाजिक उत्पादन में भी लगी रहती हैं. वे सामाजिक उत्पादन में कार्यबल का आधा हिस्सा हैं. उनका लिंग के प्रति दृष्टिकोण, उनका जाति का दृष्टिकोण अलग है.

 

सवर्ण महिलाएं मुक्त हो जाएँगी अगर वे खुद को पितृसत्ता से मुक्त करती हैं. यदि वे अपने पुरुषों के समान अवसर प्राप्त कर लेती हैं तो वह स्वतंत्र हो जाएँगी.

 

लेकिन हमारी महिलाओं की समस्याओं को देखो! उनके यहाँ जाति की समस्या है, जाति-आधारित लूट है, श्रम की समस्या है .. वे तो गुलामों की गुलाम हैं. हमारे आदमी खुद गुलाम हैं, हम गुलाम हैं. परन्तु आप? आप अपने पुरुषों के लिए गुलामी कर रहे हैं. लेकिन हम आपके पुरुषों के लिए, आप महिलाओं के लिए, अन्य सभी पुरुषों के लिए (जो खुद गुलाम हैं) गुलाम हैं.

 

राष्ट्रवादी आंदोलन में, आपकी समस्याओं का समाधान किया गया था. यह समाज पुरुषों का है. कौन से पुरुष? वे पुरुष जिनके हाथ में सत्ता है, आधिपत्य (hegemony) है. इसका मतलब है कि जो लोग संरचनाओं पर अपनी ताक़त का इस्तेमाल करते हैं, वह है पितृसत्ता! पितृसत्ता सवर्णों में पैदा हुई है… और वो सारी की सारी व्यवस्थाओं पर राज करती है… ‘दलित पितृसत्ता’ केवल अपने अपने घरों तक सीमित है.

 

यह मेरी जाति के कारण है कि मैं एक मैला ढोने वाली महिला बन गई, यह मेरी जाति के कारण है कि मुझे शिक्षा से वंचित किया गया, यह मेरी जाति के कारण है कि मैं बेरोजगार हूं, यह मेरी जाति के कारण है कि मुझे गरिमा से वंचित रखा गया है. हमें हमारा सम्मान दें. मैं पहले जाति को हटाना चाहती हूं. मेरे सिर पर जाति का भारी बोझ है. उसके बाद ही जेंडर की बारी आती है.

 

पितृसत्ता वह है जो संरचनाओं, संस्थानों को अपने कब्ज़े में लेती है और उन पर शक्ति और अधिकार स्थापित करती है. लेकिन हमारी जातियों के पुरुष केवल अपने घरों में ही सत्ता का उपयोग करते हैं, संस्थानों, संरचनाओं पर नहीं… नारीवादी उसे भी पितृसत्ता कहते हैं. और संरचनाओं पर शक्ति का इस्तेमाल करना भी पितृसत्ता है. घरों पर सत्ता और संरचनाओं पर सत्ता: वे लोग दोनों को ही पितृसत्ता कह रहे हैं.

 

यूरोप, अमेरिका में श्वेत महिलाओं की इस विचारधारा को वामपंथी ब्राह्मण महिलाएं भारत में लेकर आईं हैं. अपने घरों में घटने वाली वाली बुराइयों को देखते हुए, वहां पितृसत्ता को घरेलू हिंसा कहते हैं. लेकिन हमारी महिलाओं पर सामाजिक हिंसा है, हमारी महिलाओं पर जातिगत हिंसा है. बहुजन महिलाओं पर, दलित महिलाओं पर.

 

उन्होंने हमारे मुद्दों, समस्याओं को हल करने के लिए कोई एजेंडा तैयार नहीं किया है. सवर्ण नारीवादी 1960-70 के दशक से बात कर रहे हैं… वे घरेलू हिंसा की बात कर रहे हैं. घरेलू हिंसा, यौन स्वतंत्रता… 70 के दशक से वे बात कर रहे हैं. वे घरेलू हिंसा से आगे बढ़ते ही नहीं. (इधर) हम अभी भी भोजन पाने की जद्दोजेहद की स्टेज (चरण) में हैं. हमें अभी भी यह सोचने की ज़रूरत पड़ती है कि आज, कल शाम को कैसे जीने का प्रबंध किया जाए.. क्या हमें कल काम मिलेगा या नहीं… हम अभी भी इस स्तर पर हैं, हम उनके उस उच्च वाले लेवल/चरण तक नहीं पहुँचे हैं.

 

आपने जो राह हमारे लिए बिछाई या बनाई, आपकी व्याख्याएं, आपके सुझाए रास्ते जो ये सब आपके अनुभवों के ज्ञान से आया है और आप चाहते हो कि हम इनका अनुसरण करें. हमारे संघर्ष, हमारे आख्यान, हमारे अनुभव, हमारे इतिहास उस फ्रेम, आपके फ्रेम में फिट नहीं होते हैं. आपको यह समझना चाहिए. लेकिन जब आप इसे अपने स्वार्थ के लिए समझते हैं, और आप अभी भी कह रहे हैं कि सभी महिलाएं समान हैं.

 

क्या सभी पुरुष समान हैं, सभी महिलाओं के लिए समान हैं? अब भी, वे इस नारे के साथ आगे बढ़ते हैं कि सभी महिलाएं समान हैं. इस जातिगत समाज में, सभी की अपनी समस्याएं हैं. उन समस्याओं पर चर्चा नहीं हुई है; उन समस्याओं से निपटने के लिए एक एजेंडा विकसित करने पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है. नारीवादी भी उनके बारे में बात तक नहीं कर रही हैं. वे जोगिनी मुद्दे के बारे में बात नहीं कर रहे हैं, वे भूख की समस्या के बारे में बात नहीं कर रहे हैं जिन्हें ये ये जातियों लगातार सामना कर रही हैं.

 

वे घरेलू काम के बारे में बात कर रहे हैं. वे घरों में कचरे के निपटान (disposal) के बारे में बात कर रहे हैं. ठीक है, हमें सभी प्रकार के कार्यों भाव देना चाहिए. लेकिन, वे उन लोगों के बारे में बात क्यों नहीं कर रहे हैं जो घरों के बाहर सड़कें साफ करते हैं, जो मैला साफ़ करते हैं?

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जूपाका सुभद्रा एक कवि, लेखक, आलोचक और तेलुगु साहित्य और जाति-विरोधी संघर्षों में संघर्षरत एक महत्वपूर्ण महिला हैं. 

अंग्रेजी भाषा से हिंदी में अनुवाद गुरिंदर आज़ाद द्वारा 

मूल तेलुगु से अंग्रेजी में अनुवाद कुफिर द्वारा  

अंग्रेजी भाषा में आप इस बातचीत को Savari (www.dalitweb.org) पर पढ़ सकते हैं. 

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