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अनु रामदास (Anu Ramdas)

कुछ समय पहले की बात है जब मैं एक शूद्र संत-कवि सरलादास द्वारा लिखित उड़िया महाभारत के अनुवाद की तलाश कर रही थी. द शेयर्ड मिरर  पर सरला की गंगा पर केंद्रित एक अंश को पोस्ट करने के लिए उत्सुक थी. इसलिए मैं पुस्तकालय और इंटरनेट पर इन पर हुई खोजों को इकठ्ठा करने में व्यस्त थी कि तभी एक कविता ने मेरे ध्यान को भटका दिया. यह कविता और किसी की नहीं बल्कि एक ब्राह्मण कवि बाणभट्ट के द्वारा लिखी गई थी.

मुझे अब इस ब्राह्मण कवि से प्रेम है.

नहीं, वास्तव में ऐसा है नहीं. लेकिन मैंने जो देखा उससे मुझे बोरियत नहीं हुई जैसा कि अक्सर ब्राह्मणवादी/ मुख्यधारा के साहित्य को पढ़ते हुए होती है. हालांकि इस कविता में जाति का कोई उल्लेख नहीं है, फिर भी यह सामग्री ध्यान खींचती है. इस तरह की दुर्लभ अभिव्यक्ति जोकि एक उपनिवेशवादी डर और चिंता को खूबसूरती से रौशन करती है, वह भी बस कुछ ही काव्यात्मक पंक्तियों में. कुछ इस तरह, बाना अपने वंशजों की खातिर, मूलनिवासियों को लांछित करने के लिए, एक खाका तैयार करता है; शब्दों से बना हुआ एक ऐसा यंत्र जिसमें परिस्थितियों के हिसाब से निरंतर बदलाव की गुंजाईश बनी रहे. उपनिवेशीकरण का मतलब शायद ही कभी अधीन कर लिए गए समाज का विनाश करना होता है. दरअसल, आमतौर पर इसका मतलब है मूलनिवासियों को एक ऐसी स्थिर अवस्था में रखना जिसमें वे ‘अन्य’ के तौर पर बने रहें. और जाति का कुल मतलब ‘अन्य’ से ही तो है, है ना?

जब दमन करने वालों और दमन के शिकार लोगों की नस्ल और उनका स्थान साफ़ तौर पर अलग दिखाई न दे तब ऐसी हालत में हम, उपनिवेश की प्रक्रियाओं को कैसे चिन्हित करेंगे जैसे कि वे कहाँ से शुरू होती हैं और कैसे शुरू होती हैं? जबकि ये प्रिक्रियाएं भीतर ही भीतर अपना काम कर रही होती हैं. हो सकता है दोनों पक्षों के आख्यानों (narratives) में चिन्हित किया जा सके(?).

हर्षचरित्र और कादम्बरी में, बाना अच्छे-खासे तौर पर स्पष्ट करता है कि वह ब्राह्मण केंद्रित विश्वदृष्टि से लिखता है. शुरुआत में ही, अपने कल्पित और गैर-कल्पित दोनों तरह के लेखन कार्यों में वह अपने त्रुटिहीन ब्राह्मण वंश को, एक ख़ास रूप से किसी गैर-मानव के लिए, स्वर्गीय मूल से जोड़ता है.

अब, आइए देखें कि कादम्बरी के एक विशेष प्रकरण में कैसे बाना इस ‘अन्य’ का निर्माण करता है. नीचे दिए छंद एक दृश्य का चित्रण करते हैं जिसमें एक तरफ सवारा है और दूसरी तरफ बाना के ‘सभ्य’ नायक हैं जो कि जंगलों में भीतर तक अतिक्रमण करते चले आये हैं. अब वे आमने-सामने हैं. इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि सवारा लोग इस भूमि के शुरुआती निवासियों में से एक हैं. इस प्रकार इस कविता में हम एक ब्राह्मण के दृष्टिकोण से सवाराओं को देख रहे हैं. एक लेखक के लिए किसी ‘अन्य’ का चित्रण एक युद्ध के सीन (दृश्य) में करना आसान है, बस एक साफ-सुथरी चाल चलके, आप अपने पाठकों को यह सुनिश्चित करते हैं कि वे जान लें कि किससे डरना है, किससे नफरत करनी है और घृणा करनी है. यह एक साहित्यिक जुगत है जो उतनी ही पुरानी है जितनी कि खुद कहानी कहने की कला. बाना हमें एक ‘शत्रु’ की पृष्ठभूमि देता है, एक होशियार ब्यौरा पेश करता है, गोया सवारा के जीवन-मार्ग का वर्णन करने वाले प्रशिक्षित मानवविज्ञानियों को उठ-बैठने और इसका नोटिस लेने को कह रहा हो. यहाँ बाना सवारा का वर्णन शुरू होता है:

ओह, वे ज्ञान से रहित जीवन जीते थे

बुद्धिमान पुरुषों द्वारा उनके जीवन की निंदा की जाती है

वे मांस, शहद खाते हैं

जिसका सेवन सभ्य समाज में वर्जित है

//

सटीक पटकथा लेखन सामग्री!

कविता की पहली पंक्ति बताती है कि शत्रु के पास मानव जाति का सबसे शक्तिशाली हथियार नहीं है, यानि ज्ञान नहीं है.

दूसरी पंक्ति इसे किसी तीसरे पक्ष द्वारा निंदा के साथ प्रमाणित करती है, निंदा के लिए कोई प्रमाण या कारण की आवश्यकता नहीं है. तीसरे पक्ष को तटस्थता के लिए किसी नाम या दावे की आवश्यकता नहीं है, बस उनके एक ‘बुद्धिमान’ होने का टैग लगा दें, और इसी से काम चल जाता है.

तीसरी पंक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है, ये आहारों (food) में अंतर को सूचीबद्ध करती है, और आने वाले किसी भी समय के लिए इस ‘अन्य’ या ‘दुसरे’ को पूरी दृढ़ता से स्थापित करती है. आहारों से घृणा की राजनीति फेल-प्रूफ होती है यानि कभी असफल नहीं होती, बल्कि ये गुरुत्वाकर्षण की तरह काम करती है. यह दूसरे से स्वयं को अलग बनाए रखने के लिए ज़रूरी है. बाना, अपने ब्राह्मण कवि के रोल में अभी आगे भी हाज़िर है. बाना, ब्राह्मण कवि परिदृश्य पर बार बार दिखता है. उपरोक्त कविता से पाठकों के लिए घर ले जाने (यानि अपने अवचेतन में बसा लेने) के लिए संदेश है:

बाना के नायकों के लिए जीत स्पष्ट और आसान है; हमारा (बाना के नायकों का) वास्ता ‘ज्ञान-रहित प्राणियों से है!’

कवि महोदय ने हमें ऐसे ही गुणों के और अधिक विस्तार के लिए रख छोड़ा है, जिसमें आगे बढ़ने का केवल एक ही तरीका है. वह तरीका है एक नीचे की और जाता हुआ घुमावदार रास्ता. इस घुमावदार रास्ते में होता यह है कि हमारे लोगों में मनुष्यों जैसे लक्षण कम-दर-कम होते चले जाते हैं.

उनका शारीरिक व्यायाम शिकार करना है

उनकी बुद्धि

पक्षियों का स्वभाव समझने में निहित है

उनके सहवासी कुत्ते हैं

तनहा जंगल उनका साम्राज्य है.

//

तो (देखिये) अब यह (रास्ता) नीचे की तरफ जा रहा है या ऊपर की तरफ?

इस कविता ने मेरी कोहनी की नस को थोड़ा सा गुदगुदाया, जैसे, शायद इसमें ‘राजनीतिक रूप से ही सही’ कुछ ब्राह्मणवादी आत्माएं छटपटा रही हैं. हो सकता है ऐसा न हो. चिंता मत करो, प्रिय, यह बाना पूर्व आधुनिक समयों का है,  चलो उसे थोड़ा और उधेड़ें!

उसे हरित आंदोलन के बारे में कुछ नहीं पता, विशेष विषय, जैसे कि ऑर्निथोलॉजी या पर्यावरणीय विज्ञान जैसे जटिल बहु-विषयक विषय जो अभी पैदा भी नहीं हुए थे, और पालतू संस्कृतियाँ जिन्हें अभी तक हमारे समय के बहु-मिलियन डॉलर के उद्योग को शुरू करना था. इसके बजाय, आईये हम पंक्ति 9 में उनकी प्यारी-सी अंतर्दृष्टि पर ध्यान दें: “तनहा जंगल उनका साम्राज्य है!” और इसके आगे है.

वे बाघ जैसे क्रूर जानवरों के साथ रहते हैं

(इसलिए वे क्रूर हैं)

वे अपने ईष्टों को जानवरों के खून से खुश करते हैं

चोरी करना उनकी जिंदगी है

उनके आभूषण कोबरा के गहने हैं. (1)

ये छंद किसी भी व्यक्ति के लिए स्वतः स्पष्ट हैं. जो इस बात को थोड़ा भी जानते-समझते हैं कि कैसे एक उपनिवेशवादी, मूलनिवासीयों से डरता है, उनकी जीवन शैली, उनकी क्षमताओं, स्थानीय पर्यावरण के बारे में उनके ज्ञान से डरता है, जिसे उपनिवेशक फटाफट, उग्रता से हासिल कर लेना चाहता है. (इस बात की बानगी देखिये) जंगल तनहा है, लेकिन, यह एक साम्राज्य है!

फिर, ब्राह्मण कवि बाना, एक वैश्विक कुलपति (global patriarch) के रूप में उभर के आता है और अपने समय के ‘सवाराओं’ के लिंग-संबंधों (gender relations) के ऊपर अपने विचार पेश करता है.

उनकी पत्नियाँ वे महिलाएं हैं जिन्हें बंदी बनाया गया था.

वे दूसरों की पत्नियां थीं. (1)

यहाँ बाना को अपनी अवमानना ​​व्यक्त करने के लिए बहुत सारे शब्दों की आवश्यकता नहीं पड़ती है, बल्कि केवल दो पंक्तियों में ही किसी को भी अपवित्रता की पूरी ताकत मिल जाती है. वो अपवित्रता जो उसने (बाना ने) उन महिलाओं के साथ जोड़ दी है जो औरों की पत्नियाँ हैं, और उन पुरुषों के साथ जोड़ दी गई है जो इस बात को स्वीकार कर रहे हैं. कैप्चरिंग पार्ट (इस बात को वश में करने के लिए) के रूप में, इंटरनेट की देवी अपने रुचि रखने वाले पाठकों के लिए अन्य संभावनाओं को तलाश करेगी:

सवारा लोग, विवाहित और अविवाहित, दोनों तरह के पुरुषों और महिलाओं को (प्रेमी/प्रेमिका संग) भाग जाने की अनुमति देते हैं, दूसरी शादी पुरुषों और महिलाओं के लिए आम है (2) एक गर्भवती महिला अपनी पहली शादी से बाहर निकलती है और दूसरे पति की तलाश करती है, और इस कारण धरती फट जाने जैसी कोई उथल-पुथल नहीं होती, नए परिवार में बच्चे का स्वागत किया जाता है. सवारा पुरुष पितृसत्ता के व्यापक मॉडल जो महिलाओं से जुड़ी सभी चीज़ों को लेकर पुरुषों के भीतर बेलगाम डर के गिर्द घूमता है, के खिलाफ जाते प्रतीत होते हैं. बेशक बाना को उसकी ब्राह्मणवादी विरासत के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है; उसका दो बार जन्म लेने का स्टेटस अपने आप में ही गर्भ नियंत्रण के मसले के गिर्द घूमता है. उपनायना के समारोह में कुछ इतिहासकारों द्वारा यह दिलचस्प व्याख्या दी गई है:

ब्राह्मणवादी साहित्य के आधार पर, जैविक प्रजनन को एक संरचना में बाँधने और इसे एक खास सामाजिक संदर्भ में खोजने का प्रयास किया गया है. एक पत्नी को प्रसव के यंत्र (instrument) के रूप में बनाया गया, और ऐसा उसकी प्रसूता (प्रजनन संबंधी) शक्तियों को कई प्रकार के अनुष्ठानों के ज़रिये अपना बनाकर किया गया. इस तरह, उसे (एक पत्नी को) प्रजनन प्रक्रिया में भाग लेने तक की ही उम्मीद थी, जबकि पैदा हुई संतानों पर उसके दावे उसके पति के अधीन थे. इसके विस्तार को समझने की कोशिश करें तो बच्चे, विशेष रूप से बेटे, रिवाज़ अनुसार पिता से जुड़े थे और विपरीत क्रम अनुसार, पिता अपने बेटे-बेटों से जुड़े थे. इसके अलावा संतानों को पैदा करने के लिए अनुष्ठान, मंत्र आदि को आम तौर पर, एक बेहतर साधन के रूप में चित्रित किया गया था, जो कि संतान पैदा करने के लिए शारीरिक प्रक्रिया के सयोंग के हिसाब से उल्ट बात थी. इसे मासिक धर्म और प्रसव जैसी संबंधित प्रक्रियाओं को प्रदूषित बताकर प्रबलित रूप में लागू किया गया. एक अर्थ में, इस का आखिरी परिणाम उपनायाना या इसके श्रीगणेश को ही लाभ पहुँचाता है, जिसे दूसरा यानि आध्यात्मिक जन्म माना जाता था। इसे, पहले वाले मामले जिसमें शारीरिक रूप में जन्म लेने की बात है, उससे बेहतर रूप में देखा गया था.

गैर-ब्राह्मण पुरुषों और महिलाओं का वर्णन करना बाना के लिए कई प्रकार के प्रदूषणों को स्वीकार करने और उन्हें मजबूत करने के लिए कहता है.

गैर-ब्राह्मण समुदायों की महिलाएं, जो समावेश (assimilation) का लगातार विरोध करती हैं, उन्हें उन आख्यानों (narratives) की खोजबीन और पड़ताल करनी पड़ती है ताकि भीतर ही भीतर चल रहे बस्तीवाद को शाब्दिक और गैर-शाब्दिक कई तरह के स्रोतों के साथ तोड़ा-फोड़ा जा सके.

इकॉन, चित्रित कथाएँ

हालांकि सवारा के बारे में बाना काफी जानकार हैं. मुझे यकीन नहीं है कि अगर बाना उनके इकॉन-आभूषित घरों पर कहीं और टिप्पणी करते हैं तो (4) उन चित्रों का क्या मतलब होगा?

ज्ञान के बिना जीने वाली जिंदगियों से चित्रकला जैसे कूटलेखन ज्ञान की पुड़िया बनाई जाए, ऐसा नहीं सोचना चाहिए. शायद बाना का मानना ​​था कि लिखे-हुए-शब्द, सवारा कला को स्मृति से मिटा देने के बाद, लंबे समय तक बने रहेंगे. या आसान भाषा में यूं कहें है कि सवारा कला में ज्ञान की व्याख्या इतने आसान रूप में नहीं की गई जितनी कि लिखित ग्रंथों की व्याख्या. जिससे कि मैं पूरे दिल से सहमत हूँ.

यह प्रश्न पूछते हुए कि क्या हमारे पास कोई कौशल है जिसके ज़रिये हम इन आख्यानों (narratives) को जो इस कला के रूप में अंतःस्थापित (embedded) हैं समझा सकें, विवादास्पद होगा. दरअसल हम ब्राह्मणवादी शिक्षा प्रणाली के उत्पाद (product) हैं और एक गैर-ब्राह्मणवादी विरासत को समझने के लिए यह सीखा हुआ कौशल हमारे किसी काम नहीं आ सकता, ठीक है? एक चूक-गए विकल्प के बारे में क्या कहना है, बस, पश्चिमी लेंस पहनें और कल्पना करें कि इस कला पर कांत (Kant) संभवता क्या कहते, या फिर उत्पादन में लगे मनुष्यों की तस्वीरों और इसे प्रस्तुत करने वाली सामाजिक व्यवस्था पर मार्क्स (Marx) की संभावित टिप्पणी क्या होती, या फिर ऑड्रे लॉर्ड (Audre Lorde) को पुरुषों और महिलाओं को समान रूप से प्रस्तुत करती छवियों पर क्या कहना होता. (लेकिन) मेरे अपने उस प्रशिक्षण और उस वास्ते का क्या जो इस बात को एन्क्रिप्ट करने से हासिल हुआ है कि एक मशीन के पढ़ने की क्षमता के पीछे प्राकृतिक विज्ञान कैसे काम करता है? क्या मैं ज्ञान के कोडों (codes) को डिकोड (decodes) करना शुरू कर सकती हूँ? प्राकृतिक विज्ञान के वैसे कोड जो कि सवारा पेंटिंग्स में दिखाए हैं, एक लापरवाह समीक्षक के द्वारा अस्वाभाविक प्रतीकों के रूप में?

ये वास्तविकता, वनस्पतियों, जीवों, मनुष्यों और उनकी गतिविधियों का सचित्र प्रतिनिधित्व हैं. उनके भीतर के प्रतीकवाद को महसूस करने में सक्षम होने के लिए मानव जाति के इतिहास की गहन समझ, बदलते माहौल और प्राकृतिक विविधता के महत्वपूर्ण ज्ञान पर पकड़; सांस लेने वाली ज़िन्दगी की सामयिक प्रकृति जो निर्जीव और संजीव दोनों में मौजूद है, वास्तविक और मिथकीय दुनियाएं, उसकी थाह लेने के काबिल होना पड़ता है. उत्पति (origins), और विज्ञान (science) और प्रौद्योगिकी (technology) की चित्रलेखिये (pictographically) तरीके से रिकॉर्डिंग यानि दर्ज करते रहने की निरंतरता की सराहना करनी होती है.

हमें एक इकॉन या गैर-ब्राह्मणवादी दुनिया के विभिन्न गैर-पाठीय कथाओं की जैविक व्याख्या शुरू करने के लिए कई परतों को खोलना होगा. कठिन काम है ये, वाकई!

एक ब्राह्मण कवि का यथार्थ को लेकर क्या दर्शन हो सकता है? ये काम आप मुझे दीजिये डिकोड करने के लिए. इसे डिकोड करना मेरे लिए हंसी-मज़ाक भर जैसा है.

इसी तरह, आधुनिक समय में बाणभट्ट की कल्पना करें, जिसे एक इकॉन पेंटिंग दी गई है और देखें कि वह इसका क्या बनाता है. उम्मीद है, वह महिलाओं के आंदोलन और अन्य सभी ‘आधुनिक’ वास्तविकताएं जो सवारा की इकॉन पेंटिंग की प्राचीन प्रथा में निहित हैं, समझ लेगा.  

यह लेख ब्राह्मणवादी और गैर-ब्राह्मण आख्यानों (narratives) की एक साथ परीक्षा लेने के सरल से हिसाब-किताब को फिर से बताने के लिए नहीं है, बल्कि ऐसा करना तो अपने मज़े के लिए है. कविता और पेंटिंग, लिखित और मौखिक, मरसिया और शलोक – आख्यान (narrative) जो स्वरूपों में भिन्न हैं, का उपयोग अपनी सहायता के लिए किया जा सकता है क्योंकि हम आंतरिक बस्तीवाद (उपनिवेश) की प्रक्रियाओं का मुकाबला करने के फेरे में पड़े रहते हैं. एक फॉर्मेट (प्रारूप) एक सूखी टहनी को तड़काने जैसा आसान लग सकता है, जैसे कि बाना की कविता का है, लेकिन दूसरा फॉर्मेट बेहद कठिन हो सकता है, जैसे कि इकॉन. हमें उनमें गढ़ी हुई जानकारी निकालने के रचनात्मक तरीके खोजने होंगे ताकि उनका पुन: उपयोग कर सकें और नए तरीकों से इसको अन्य काम में ला सकें. ऐसा इसलिए नहीं कि एक मौलिक, आदर्श सामाजिक व्यवस्था की तलाश की जाए, बल्कि ऐसा इसलिए है कि अपनी मुक्ति के वो पहलु जो ब्राह्मणों द्वारा दिए गए शर्म, जहालत या ज्ञान के आख्यान (narrative) के तले दफन हैं, उन्हें वापिस लाना है. इन आख्यानों (narratives) को खोलना (unpack) और इनका विरोध करना ही हमें स्थापित करेगा. जो महिला ब्राह्मणीकरण का विरोध कर रही है, एक ऐसी दुनिया की कल्पना करने के लिए स्वतंत्र है जो कि महिला लैंगिकता (female sexuality) पर ही जड़ नहीं है. पुरुषों का एक वह जहान जो अपनी पत्नियों के गर्भ पर अपनी दावेदारी या उन्हें नियंत्रित करने की उत्साही ज़रुरत में पगलाया न हो. एक ऐसी दुनिया जहाँ युवा पुरुषों को डर के बजाय, महिला के मन और शरीर के साथ विश्वास के साथ, एक साथी के रूप में विकसित किया जाए. और युवतियाँ को अपराधबोध के बजाय आत्मविश्वास के साथ पुरुष की पोषण विशेषताओं के साथ, साथी के रूप में बड़ा किया जाए. जहाँ अमानवीय और भद्दी जाति की दर्जेबंदियाँ भंग हो जाएँ. जहाँ पुरुषों और महिलाओं के पास, सपने देखने और सपने देखने के लिए एक समान संसाधन, समय और स्थान हों.

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स्रोत

1) Tribal roots of Hinduism. Shiv Kumar Tewari

2) Savara, an ethnographic profile

3) Women in early Indian societies. Ed. by Kumkum Roy.

4) The Sauras and their panoramic paintings. C. B Patel

चित्र: सौजन्य इंटरनेट

नोट: सौरस की वाल-पेंटिंगों को इकॉन या इटालोन कहा जाता है।

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अनु रामदास राउंड टेबल इंडिया की संस्थापक संपादक हैं.

नोट: यह लेख मूल रूप में अंग्रेजी में है जो कि पहली बार अप्रैल 2011 में ‘राइटिंग कास्ट’ पर प्रकाशित हुआ था. अब ये ब्लॉग बंद हो चुका है। दूसरी बार यह आर्टिकल राउंड टेबल इंडिया (इंग्लिश) पर  अंग्रेज़ी ;और फिर इसका कन्नड़ा में अनुवाद प्रकाशित हुआ.

अनुवाद: गुरिंदर आज़ाद (संपादक, राउंड टेबल इंडिया, हिंदी)

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