अरविंद शेष (Arvind Shesh)

बेशक इसरो के चीफ वैज्ञानिक माधवन नायर या वैज्ञानिक राधाकृष्णन या वैज्ञानिक के. शिवन के मुकाबले आइएएस टीना डाबी की जिम्मेदारी ज्यादा है अंधविश्वासों के खिलाफ वैज्ञानिक चेतना को निबाहने की, उसे मजबूत करने की! इसरो के वैज्ञानिक माधवन नायर या राधाकृष्णन अगर किसी भी अंतरिक्ष यान के प्रक्षेपण के पहले बालाजी तिरुपति या किसी मंदिर में मंगलयान या किसी भी स्पेस शटल की रेप्लिका रख कर घंटों बैठ कर घंटी हिला कर यह प्रार्थना करें कि हे भगवानङ्घ मंगलयान का प्रक्षेपण कामयाब हो, तो इसे उनकी निजी आस्था के तौर पर देखा-माना जाएगा। भले ही वैज्ञानिक के पट्टे के साथ इस तरह का कर्मकांड करना दरअसल मंदिर-व्यवस्था की मार्फत ‘लोक के भूदेव’ की सत्ता बचाने की राजनीति होती हैङ्घ सबको यह बताने-जताने की कोशिश होती है कि देखोङ्घ जब वैज्ञानिक भी ईश्वर और मंदिर की पनाह में जाकर ही अंतरिक्ष में यान भेजता है, तो हम साधारण इंसान किस खेत की मूली हैंङ्घ! हमें तो केवल मंदिर-व्यवस्था और उसके संचालकों के सामने बस हाथ जोड़े श्रद्धाभाव से सब कुछ देखना और अपने भीतर सब कुछ उतारना है!

तो इस व्यवस्था और मानस को बचाने और कायम रखने में अपनी भूमिका और जिम्मेदारी समझ कर वैज्ञानिक माधवन नायर या वैज्ञानिक राधाकृष्णन या वैज्ञानिक के शिवन बाकायदा औपचारिक और आधिकारिक तौर पर वैज्ञानिक अभियान के पहले सार्वजनिक रूप से पारलौकिक अंधविश्वासों का बेशर्म प्रदर्शन करते हैं! लेकिन टीना डाबी..?

टीना डाबी कोई वैज्ञानिक भले नहीं हैं, लेकिन वे कोई साधारण समझ वाली महिला भी नहीं हैं। वे आइएएस हैं और उनसे यह उम्मीद की जाएगी कि वे जिस सामाजिक पृष्ठभूमि से आती हैं, उसमें वे इस मुकाम पर आने के बाद गुलामी को पुख्ता करने वाले प्रतीकों के खिलाफ अगर न भी खड़ी हों तो कम से कम मजबूत न करें! वे अगर पंडों और ब्राह्मणवाद की गुलामी के सारे प्रतीकों के साथ कर्मकांडी दफ्तर-प्रवेश करती हैं, तो उन पर सवाल उठेंगे। यह याद रखना चाहिए कि बड़े जतन से दलित समाज ने ब्राह्मणवाद से आजादी के सपने का संघर्ष खड़ा किया है, जिस पर आज हजारों ओर से एक साथ हमला किया जा रहा है और वे आततायी कौन हैं, यह टीना डाबी से भी छिपा नहीं होगा शायद!

उन्हें यह याद रखना चाहिए कि उन पर दो तरह के लोगों की नजरें हमेशा टिकी रही हैं। एक वे, जिन्होंने उनके आइएएस में टॉप करने के बाद ढेर सारी उम्मीदें पाल ली थीं, उनका मनोबल ऊंचा हुआ था, उनके सामने एक प्रेरणा खड़ी हुई थी। दूसरे वे, जो हमेशा ही इस बात की ताक और फिराक में थे कि वे कब इसी तरह के दृश्यों में कैद दिखें कि दलित समाज को बताया जाए कि देखो, जिसे तुम नायिका के रूप में पेश कर रहे थे, वह उसके नायकत्व की हकीकत क्या है! दूसरे वाले ‘वे’ को पता है कि टीना डाबी को अंधविश्वासी और ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देने वाली तस्वीर में कैद कर लेने के बाद उन्हें इस रूप में पेश करना शेष दलित समाज के मनोबल को तोड़ने में, शर्मिंदा करने में कितना काम आएगा। इसलिए उनका यह प्राथमिक धर्म था कि वे ‘कर्मकांडी और ब्राह्मणवादी’ टीना डाबी को कठघरे में खड़ा करें।

तो कथित वैज्ञानिकों के कर्मकांड और पूजा-पाठ को निजी आस्था के रूप में आदरपूर्वक स्वीकार करने वाले लोग अगर टीना डाबी के ब्राह्मणवादी कर्मकांडीय तस्वीरों पर उल्लसित दिख रहे हैं तो यह स्वाभाविक है। सवाल है कि टीना डाबी के ब्राह्मणी कर्मकांडी तस्वीरों के सामने आने के बाद जश्न मनाने वाले लोग जिस तरह कूद-कूद कर उत्साह से टीना डाबी से वैज्ञानिक चेतना से लैस होने की मांग कर रहे हैं, इसमें उनकी नाकामी पर पूरे उत्साह से उन पर सवाल उठा रहे हैं, (उठाना भी चाहिए!) क्या उन्होंने कभी देश में विज्ञान और वैज्ञानिक सोच के प्रतीक के रूप में जाने वाले भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के मुखियाओं के सरेआम अंधविश्वास प्रदर्शन पर इतना ही तीखा सवाल उठाया? विज्ञान विषय की पढ़ाई के बूते अपनी जिंदगी और कॅरियर बनाने-चलाने वाले लोगों के मंदिर-मंदिर जाकर अपनी आस्था-प्रदर्शन पर कभी इतनी ही शिद्दत से फिक्र जाहिर की? विज्ञान का झंडा उठा कर अंधविश्वास परोसने-पसारने वाले लोगों-संगठनों की निर्लज्जता को कभी कठघरे में खड़ा किया? कभी पूछा सरकार से कि जिस संविधान ने धारा-51 ए (एच) के तहत उसे और सभी भारतीय नागरिकों को वैज्ञानिक चेतना के प्रसार की जिम्मेदारी सौंपी है, उसे निबाहने के लिए क्या-क्या किया जाता है?

उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि ऐसा नहीं करने से उनकी सामाजिक सत्ता की कुर्सी के पाए मजबूत होते हैं, रहते हैं। लेकिन यह स्वीकार करना होगा कि टीना डाबी को कठघरे में खड़ा किया जाना जरूरी है, क्योंकि टीना डाबी ने जिस तरह अपना वह मुकाम हासिल किया है, उसमें सत्ताधारी तबकों की राजनीति उन जैसी शख्सियत को प्रतीक बना कर पेश करती है, शर्मिंदा करने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करती है। टीना डाबी को व्यवस्था में बने रहने की मजबूरी के तहत दफ्तर-प्रवेश या शुभ-मुहूर्त जैसा कर्मकांड निबाहना था भी, तो ऐसे कर्मकांड के सार्वजनिक प्रदर्शन से बचना उनकी ही जिम्मेदारी थी। उनकी चेतना अगर ब्राह्मणवाद में ठहरी हुई है तो कोई बात नहींङ्घ इसके लिए वे आजाद हैं, लेकिन सवाल है कि उन्होंने अपने सरकारी दफ्तर-प्रवेश के कर्मकांड का जो सार्वजनिक प्रदर्शन किया, क्या उसके लिए उन पर कोई दबाव काम कर रहा था? यह समझा जा सकता है कि मौजूदा दौर में ब्राह्मणवाद का जिस पैमाने पर उभार हुआ है, तो उसका असर व्यवस्था और तंत्र के भीतरी जाल में दिख रहा होगा। उस जाल में किसी दलित-बहुजन व्यक्ति के लिए खुद को बचा पाना ही एक बड़ी चुनौती हो गई है। दलित-बहुजनों के खिलाफ न केवल समाज में, बल्कि ऊंचे पदों से लेकर निचले पदों तक पर बैठे ब्राह्मणों और सवर्णों के सार्वजनिक बर्ताव में इतना बड़ा फर्क आया है, जिसे साफ देखा और महसूस किया जा सकता है। ऐसा लगता है कि ब्राह्मण-सत्ता के पुनरोत्थान के इस दौर में सत्ताधारी जातियों के मानस और व्यवहार में आक्रामकता और बेलगामी आना स्वाभाविक है। वे अपने सामने सिर उठा कर खड़े होने वाले दलित-बहुजनों को निशाना बनाएंगे ही। ऐसे में टीना डाबी से बहुत उम्मीद लगाना भी शायद ज्यादा है!

हालांकि टीना डाबी के ब्राह्मणी कर्मकांडी निबाहने वाली तस्वीरों से उल्लसित लोगों के लिए यह सूचना है कि दलित-बहुजन समाज किसी कामयाबी पर टीना डाबी जैसे प्रतीकों को सम्मान जरूर देता है, लेकिन इस तरह की छवि में सामने आने के बाद उन्हें खारिज करने की भी हिम्मत रखता है! यह ऊंच कही जाने वाली जाति-संवेदना में जीने वाले सत्ताधारी जातियों-तबकों की खासियत रही है कि कुकर्मों, अनैतिकता, शातिरपने जैसी तमाम खलनायकी तस्वीरों के बावजूद वह किसी वैसे व्यक्ति को अपने नायक के रूप में सार्वजनिक स्वागत करता है और उस पर गर्व करता है। यही उसकी सत्ता का ‘राज’ है और दलित-बहुजन समाज इस ‘राज’ के बरक्स खड़ा है!

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अरविंद शेष हिंदी जगत के जाने माने पत्रकार हैं. वह एक ब्लॉगर, कहानीकार और कवि भी हैं.  बहुजन दृष्टिकोण से दुनिया को देखते-समझते हैं.

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