डॉ अंबेडकर का अंतिम निर्णय हमारा पहला निर्णय क्यों होना चाहिए?

Sanjay Shraman Jothe 3 7 19

संजय श्रमण जोठे (Sanjay Shraman Jothe) जिस तरह संस्कृति और धर्म के आयाम को बहुजनों ने अपने भविष्य की रणनीति हेतु न इस्तेमाल करके इसे पूरी तरह आर्य ब्राह्मणों के हाथों मे छोड़ा हुआ है उसी तरह एक अन्य ताकतवर आयाम है – आध्यात्मिकता और मनोविज्ञान। यहाँ आध्यात्मिकता शब्द का इस्तेमाल करने मे खतरा है […]

ऐतिहासिक अंबेडकरवादी दलित-बहुजन छात्र आंदोलन की भूमिका: आलोचना एवं पर्याय

KUNAL RAMTEKE

समतामुलक समाज निर्माण के संदर्भ मे छात्र आंदोलन से एक अपील कुणाल रामटेके (Kunal Ramteke) मैं सुझाव में आपके सम्मुख इन अंतिम शब्दों को रखता हूँ- शिक्षित बनो, आन्दोलन करो और संगठित हो, स्वयं पर विश्वास रखो व् उम्मीद कभी मत छोड़ो. चूँकि न्याय हमारे पक्ष में है, तो नहीं लगता कि इस लड़ाई को […]

धार्मिक द्वंद से आगे: यूनिफार्म सिविल कोड की ओर

Ayaz Abhijit

अयाज़ अहमद (Ayaz Ahmad) अभिजीत आनंद (Abhijit Anand) कुछ माह पहले ही तीन तलाक़ को अवैध घोषित कर के माननीय उच्चतम न्यायालय ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधारों की आवश्यकता पर एक सार्थक बहस की शुरुआत की थी। लेकिन पितृसत्तावादी कट्टरपंथी शुरू से ही इस फ़ैसले को सामाजिक स्तर पर नाक़ाम करने पर तुले हुए […]

ज्योतिबा और डॉ. अंबेडकर में एक समानता और एक स्वाभाविक प्रवाह

sanjay jothe2

  संजय जोठे (Sanjay Jothe) ज्योतिबा फुले और अंबेडकर का जीवन और कर्तृत्व बहुत ही बारीकी से समझे जाने योग्य है. आज जिस तरह की परिस्थितियाँ हैं उनमे ये आवश्यकता और अधिक मुखर और बहुरंगी बन पडी है. दलित आन्दोलन या दलित अस्मिता को स्थापित करने के विचार में भी एक “क्रोनोलाजिकल” प्रवृत्ति है, समय […]

किसकी चाय बेचता है तू (Whose Tea Do You Sell)

  Braj Ranjan Mani किसकी चाय बेचता है तू ~ ब्रजरंजन मणि अपने को चाय वाला क्यूँ कहता है तू बात-बात पे नाटक क्यूँ करता है तू चाय वालों को क्यों बदनाम करता है तू साफ़ साफ़ बता दे किसकी चाय बेचता है तू !   खून लगाकर अंगूठे पे शहीद कहलाता है और कॉर्पोरेट […]