Sanjay Shraman Jothe 3 7 19

संजय श्रमण जोठे (Sanjay Shraman Jothe)

Sanjay Shraman Jothe 3 7 19जिस तरह संस्कृति और धर्म के आयाम को बहुजनों ने अपने भविष्य की रणनीति हेतु न इस्तेमाल करके इसे पूरी तरह आर्य ब्राह्मणों के हाथों मे छोड़ा हुआ है उसी तरह एक अन्य ताकतवर आयाम है – आध्यात्मिकता और मनोविज्ञान। यहाँ आध्यात्मिकता शब्द का इस्तेमाल करने मे खतरा है लेकिन मनोविज्ञान और समाज मनोविज्ञान शब्द का इस्तेमाल अवश्य ही किया जा सकता है और किया जाना चाहिए। बहुजनों ने सर्वप्रथम संस्कृति धर्म और कर्मकांडों का आविष्कार किया है। भारत ही नहीं पूरे विश्व मे सभ्यता, संस्कृति और धर्म का निर्माण स्थानीय समाजों ने किया है जिस पर कालांतर मे आततायी समूहों ने अधिकार किया है। इस पूरी प्रक्रिया मे सब कुछ नकारात्मक ही नहीं हुआ है बल्कि बहुत कुछ सकारात्मक भी हुआ है। आक्रमणों, युद्धों और आधिपत्य की लंबी श्रंखला मे विभिन्न समाजों और संस्कृतियों के बीच संवाद, प्रतियोगिता, संश्लेषण और नव-निर्माण हुआ है। पूरे विश्व मे इसके उदाहरण भरे पड़े हैं। 

अक्सर हम संस्कृति धर्म और कर्मकांडों को मनोविज्ञान और समाज मनोविज्ञान से भिन्न विषयों की तरह देखते हैं। यह गलत नजरिया है। सही नजरिए से गौर से देखा जाए तो धर्म और कर्मकांड असल मे मनोविज्ञान का ही एक आयाम है। आपको दी गयी धार्मिक शिक्षाएं और आपको सिखाये जाने वाले कर्मकांड असल मे आपके व्यक्तित्व और समाज मे एक खास किस्म का मनोविज्ञान पैदा करते हैं। आपका शोषण करने वाले सभी वर्ग और समूह इसी मनोविज्ञान के आधार पर अपना खेल जारी रखते हैं। इसलिए संस्कृति धर्म और कर्मकांडों को मनोवैज्ञानिक संघर्ष के रूप मे देखना और समझना सीखना होगा। भारत के बहुजन बार बार हारते हैं इसका सबसे गहरा कारण यही है कि उनके अपने परिवारों बच्चों और महिलाओं का मनोविज्ञान उनके अपने शत्रुओं के द्वारा निर्मित और संचालित किया जाता है। बहुजनों के हर परिवार मे कथाएं उपवास, त्योहार, व्रत और उत्सवों के जरिए यह मनोविज्ञान निर्मित किया जाता है। बहुजन इस मनोविज्ञान को बदले बिना जितनी भी लड़ाइयाँ लड़ते हैं उन सबमए वे हारते आए हैं और अगर इस मनोविज्ञान को नहीं बदला गया तो आगे भी लगातार हारते रहेंगे। सांस्कृतिक वर्चस्व की लड़ाई को समाज-मनोवैज्ञानिक वर्चस्व की लड़ाई के रूप मे जब तक नहीं समझेंगे तब तक बहुजन हारते रहेंगे।  

जिन संस्कृतियों और समूहों ने किन्ही अन्य पर आक्रमण करके उन्हे जीता है उनके अपने स्थानीय समाजों पर अन्य संस्कृतियों और समाजों के आक्रमण और आधिपत्य इत्यादि से महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं। इस तरह कोई भी समाज न तो पूरी तरह आक्रमण करने वाला समाज रहा है न ही पूरी तरह आक्रमण झेलने वाला समाज रहा है। सभी ने आक्रमण किया और झेला है। जैसे एक मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन मे तेजी से अन्य मनुष्यों का प्रभाव होता है और वह मनुष्य स्वयं अन्य मनुष्यों को प्रभावित करता रहता है उसी प्रकार संस्कृतियों और समाजों के जीवन मे भी प्रभावित होने और प्रभावित करने की समानांतर प्रक्रियाएं चलती रहती हैं। लेकिन इस सबके बीच उस मनुष्य को अपने विशिष्ट व्यक्तित्व को बचाए रखकर उसका निरंतर निर्माण करना आवश्यक होता है वरना वह गुलाम बन जाता है। 

इसका भारत के बहुजनों के लिए क्या अर्थ है?

भारत के बहुजनों के लिए इसका अर्थ यह है कि जिस प्रकार आर्य आतताईयों ने चार हजार साल पहले आकर भारत की श्रमण संस्कृति से प्रतियोगिता संवाद और संश्लेषण आरंभ किया था उसके परिणाम मे हुई आर्यों की सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक विजय को चुनौती दी जाए। इस विजय और इसके बाद जन्मे सामाजिक जीवन रूपों को ठीक से समझा जाना जरूरी है क्योंकि भारत के बहुजनों पर आर्यों की विजय सामरिक राजनीतिक और कूटनीतिक विजय से अधिक सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक विजय रही है। इस विजय और इस आधिपत्य को जिस प्रकार बनाकर रखा गया है उस विशेष तरीके मे भी इस विजय की रणनीतिगत सफलता के चिन्ह और प्रमाण नजर आते हैं। विशेष रूप से पर्वों त्योहारों और उत्सवों, कर्मकांडों के आईने मे इस विजय को लगातार मजबूत करते रहने का एक निरंतर प्रयास आर्यों की तरफ से नजर आता है। 

भारत के बहुजनों ने मनोविज्ञान और आध्यात्म को अपने हित मे प्रयोग करने के प्रयासों का भी एक लंबा इतिहास रहा है लेकिन इस प्रयास मे आर्यों ने जिस तरह की मिलावट की है उसे पहिचाने बिना इस आध्यात्मिकता के महिमामंडन ने बहुत समस्याएं पैदा की हैं। बहुजन संतों द्वारा देश भर मे जिस तरह का भक्ति आंदोलन चलाया गया है उसकी मूल प्रेरणा व्यवस्था के प्रति विद्रोह मे थी। पूर्व से लेकर पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक जितने धार्मिक आंदोलन (जिन्हे भक्ति आंदोलन की तरह जाना जाता है) मे मूल प्रेरणा तत्कालीन समाज व्यवस्था को बदलने या उसके प्रति अलगाव व्यक्त करते हुए उसका विकल्प देने का प्रयास रहा है। आर्यों की सफलता इन आंदोलनों के संदर्भ मे भी गौर करने लायक है। आर्यों ने इस भक्ति आंदोलन को भी अपने ग्रेंड नेरेटिव मे सजाकर इसे सनातनी या वैदिक परंपरा का अंग बनाकर इसे सामाजिक आध्यात्मिक विद्रोह की बजाय उनके अपने पवित्र वैदिक-वेदांतिक देवताओं की भक्ति का आंदोलन बना दिया है। इस तरह उन्होंने बहुजनों के धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विद्रोह के आंदोलन को ‘भक्ति आंदोलन’ मे बदलकर उसकी मौलिक प्रेरणा और शक्ति को खत्म कर दिया है। 

इसका भारतीय बहुजनों को ठीक से अध्ययन करके इसके प्रति अपनी तैयारी करनी चाहिए। भारतीय बहुजनों को अपने धर्म और आध्यात्मिकता की प्रथकता की घोषणा करनी चाहिए। यह इसलिए भी आवश्यक है कि हर बार बहुजनों के बीच उभर रही सामाजिक सांस्कृतिक और धार्मिक बदलाव की पहल का फिर से अपहरण न हो जाए। भारतीय बहुजन अगर अपने नेरेटिव (कथानक) और अपने ग्रेंड नेरेटिव (महा-कथानक) निर्मित करने के प्रति सावधान और तैयार नहीं रहेंगे तो उनके बीच से उभरने वाले हर मुक्तिकामी आंदोलन को वेद-वेदान्त के ग्रेंड नेरेटिव मे फिट करके तुरंत उसकी हत्या कर दी जाएगी। 

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कबीर जी

एक उदाहरण से समझने का प्रयास कीजिए। कबीर की परंपरा मे एक बहुत बड़ा विद्रोह संगठित हुआ। लेकिन कबीर के बाद की शताब्दियों मे आर्यों और बहुजनों के बीच कबीर के कर्तृत्व और विचारधारा को एक ग्रेंड नेरेटिव मे ढालने का जो युद्ध चला उसमे कबीर के अपने लोग पराजित हुए। आर्यों ने बहुत शातिर ढंग से कबीर के राम और कबीर के अध्यात्म को वेदों और वेदान्त की परंपरा मे अनुवादित करके कबीर के पूरे कर्तृत्व को एक झटके मे हथिया लिया। यह एसा है कि कोई शातिर उद्योगपति किसी मजदूर यूनियन लीडर के बच्चों से कहे कि भाई तुम्हारे पिताजी बहुत महान थे लेकिन वे हमारे गुलाम थे हमारे ही पक्ष मे लिखते बोलते और गाते थे इसलिए तुम भी हमारे पक्ष मे लिखो बोलो और गाओ। भारत के पुराणों को ठीक से पढिए। आपको साफ नजर आएगा कि वेद और वेदान्त से आ रहे ग्रेंड नेरेटिव मे पूरे भारत की सभी विद्रोही परंपराओं को बहुत चतुराई से अपहरण करके बांध दिया गया है। इन विद्रोही परंपराओं के नायकों को अपने वेद-वेदांतिक आख्यानों मे आए किन्ही अवतारों और भगवानों का भक्त या अनुयायी बताकर उनका अपहरण कर लिया गया है। 

भविष्य पुराण का उदाहरण लीजिए। इसमे इस्लामिक शासन और अंग्रेजों तक का जिक्र है। इन सबके शासन का अंत होगा और आखिर मे कल्कि अवतार भारत मे सतयुग की स्थापना करेगा, ऐसी कथा बनाई गयी है। इस कथा की भयानक शक्ति को समझिए। अब जिस भी राजनीति और सामाजिक आर्थिक विचारधारा से भारत आजाद होगा और भारत मे एक स्वतंत्र समाज या सरकार की स्थापना होगी उसे उसके जन्म के पहले ही कल्कि अवतार की कहानी के माध्यम से वेद वेदान्त के ग्रेंड नेरेटिव मे समायोजित कर दिया गया है। यह कहानी समाज मे गहराई तक पहुंचाई जा चुकी है कि स्वतंत्र भारत मे कल्कि अवतार आकर पूरे भारत ही नहीं बल्कि विश्व मे सतयुग की स्थापना करेंगे। अब स्वतंत्र भारत मे जो कुछ भी बदलाव होगा उसे देखने के दो भिन्न दृष्टिकोण होंगे। 

पहला दृष्टिकोण शिक्षित और जागरूक लोगों का होगा जो कि इस सारे खेल को समझते हैं और किसी देश या समाज की राजनीतिक उथल पुथल को वैश्विक घटना के अभिन्न अंग के रूप मे देखते समझते हैं। लेकिन ये लोग एक प्रतिशत से भी कम होंगे। अक्सर ही इनका होना न होना किसी खास परिणाम को जन्म नहीं देता। दूसरा दृष्टिकोण उन अशिक्षित धर्मभीरु और गरीब लोगों का होगा जो कि पुराणों के मनोवैज्ञानिक आक्रमण से परास्त होकर हजारों साल से गुलामी कर रहा है। ये लोग भारत की पूरी आबादी मे नब्बे प्रतिशत हैं। ये लोग धर्म और अध्यात्म के जरिए बारंबार थोपे जा रहे वेद वेदान्त के ग्रेंड नेरेटिव मे आकंठ डूबे हुए हैं। ये जब भी भारत मे हो रहे किन्ही बदलावों को देखेंगे तो उसका संदर्भ उन्ही कहानियों मे ढूँढेंगे जो इन्हे पुराणों और कथाकारों ने सुनाई है। ये पुराण और कथाकार हर बार अपनी कहानी को अपडेट करके नए बदलावो को उसमे एकोमॉडेट करके पुराने ग्रेंड नेरेटिव मे सजाकर पेश कर देते हैं। इस प्रकार भारत के गरीबों वंचितों को यह समझा दिया जाता है कि जो हो रहा है वह पहले से ही लिखा हुआ है, और यह सब वेद वेदान्त मे वर्णित ईश्वर के दिव्य विधान से ही हो रहा है इसलिए तुम्हें किसी तरह के बदलाव की मेहनत की जरूरत नहीं है, तुम जो बदलाव चाहते हो वह बदलाव भी वह ईश्वर स्वयं समय आने पर करेगा। तुम बस बैठकर भजन कीर्तन करो और अगले अवतार की प्रतीक्षा करो। 

क्या भारत के बहुजन इस षड्यन्त्र को समझकर इसकी काट तैयार कर सकते हैं?

यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। अगर इस सवाल का उत्तर नहीं दिया गया तो बहुजनों की तरफ से आ रही बदलाव की समस्त प्रेरणाओं और आंदोलनों को फिर से प्राचीन महाकथा (ग्रेंड नेरेटिव) मे रखकर उसका अपहरण कर लिया जाएगा। 

उपनिवेशी काल मे आज के प्रगतिशील लोगों ने जिस समावेशी हिन्दू धर्म की प्रस्तावना दी है वह लिबरल हिन्दू धर्म भी बहुत आसानी से हिन्दुत्व के हाथ की कठपुतली बन जाता है क्योंकि सामान्य मनुष्य हिंदूइज़्म और हिन्दुत्व मे फ़र्क नहीं कर सकता। यह फ़र्क करना इसलिए भी कठिन है क्योंकि हिंदूइज़्म और हिन्दुत्व मे फ़र्क करने का अधिकार बहुजनों के पास नहीं है। उदाहरण के लिए इस्लाम या इसाइयत के ग्रेंड नेरेटिव को पूरी तरह या आंशिक रूप से बदल देने का अधिकार भारतीय मुस्लिमों या इसाइयों के पास नहीं है। यह अधिकार मध्यपूर्व के देशों या यूरोप मे वेटिकन और पोप के पास सुरक्षित है। उसे प्रकार हिंदूइज़्म के ग्रेंड नेरेटिव को समावेशी या संकीर्ण बनाने का पूरा अधिकार भारत के आर्य ब्राह्मणों के पास है। इसीलिए डॉ. अंबेडकर ने बौद्ध धर्म को चुना था ताकि इसकी मूल संरचना और इसकी व्याख्या मे बदलाव करने का अधिकार भारत के गरीबों और बहुजनों के हाथ मे रहे। 

भारत मे हिंदुइज़्म के ग्रेंड नेरेटिव को सजाने सँवारने या छोटे मोटे बदलाव करने की जब भी आवश्यकता होती है तक कोई न कोई कल्ट गुरु या बाबा पैदा हो जाता है। भारत मे हर दस साल मे उगने वाले कल्ट गुरु बाबा योगी और कथाकारों के हाथ मे असल मे कुछ खास नहीं होता। वे भी वेद-वेदान्त द्वारा परोसे गए ईश्वर और उसकी महाकथा को थोड़े हेर-फेर के साथ बार-बार नयी बोतल मे भरकर बेचते हैं। वे भी उस प्राचीन महाकथा मे कोई खास बदलाव नहीं कर सकते। ये बाबा और कल्ट गुरु उस प्राचीन महकथा को ही विज्ञान तकनीक आदि की नई खोजों मे लपेटकर पेश करते जाते हैं और भारत के बहुजनों को नए-नए तरीकों से पुरानी कहानियों शास्त्रों और कर्मकांडों मे उलझाकर चले जाते हैं। इसीलिए आज के हिंदुइज़्म को किसी संगठित चर्च पर नहीं बल्कि योग-गुरुओं और कथाकारों सहित विवेकानंद, अरबिंदो घोष और ओशो रजनीश जैसे बाबाओं पर निर्भर रहना पड़ता है। 

यहाँ एक अन्य महत्वपूर्ण बात नोट करनी चाहिए। भारत के ये बाबा योगी और कथाकार न सिर्फ हिंदुइज़्म के ग्रेंड नेरेटिव को मजबूत करते हैं बल्कि इनका पहला काम कबीर, नानक, बुद्ध, महावीर, मुहम्मद और जीसस को तोड़ मरोड़कर वेद वेदान्त मे फिट करने का होता है। भारत के सबसे सफल बाबा और धर्मगुरु वे होते हैं जो बुद्ध, कबीर, जीसस और मुहम्मद को शंकराचार्य के मायावाद मे फिट कर देते हैं। इस तरह वे न सिर्फ उपनिवेश-काल मे जन्मे हिंदुइज़्म को एक ग्लोबल और प्राचीन नेरेटिव की तरह पेश करते हैं बल्कि बुद्ध कबीर, जीसस, नानक और मुहम्मद की तरफ से आने वाली प्रस्तावनाओं को भी खत्म कर देते हैं। यह भारत के सभी बाबाओं का सबसे पसंदीदा खेल रहा है। इस खेल मे फँसकर न सिर्फ बहुजनों के सबसे प्रतिभाशाली लोग बर्बाद होते रहे हैं बल्कि स्वयं हिन्दू समाज मे जन्म लेने वाले लिबरल और मुक्तिकामी भी अपनी सारी विशिष्टता और ताकत खो देते हैं। 

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इस खतरनाक स्थिति का क्या हल है?

इसका हल सिद्धांत मे बहुत आसान है, लेकिन करने मे कठिन है। डॉ अंबेडकर ने इसका हल दिया है। वह हल यह है कि भारत के बहुजन अपनी मूल संस्कृति, सभ्यता और धर्मों की विशिष्टता की घोषणा करें। भारत के बहुजनों को अपने प्राचीन अनार्य और गैर वैदिक धर्मों की खोज करते हुए उन्हे नए परिवेश के अनुकूल बनाकर अपने समाज मे फैलाना चाहिए। इस तरह वेद-वेदान्त के ग्रेंड नेरेटिव से अपने समाज को बाहर निकालना होगा। यह बहुत धीमा और बहुत समय लेने वाला काम है। इसके लिए बहुजनों के बौद्धिक नेतृत्व को एक नए ढंग से सांस्कृतिक और धार्मिक बदलाव की तैयारी करनी होगी। राजनीतिक आर्थिक और सामाजिक मुक्ति के जितने भी आंदोलन चल रहे हैं उनमे सांस्कृतिक, धार्मिक और मनोवैज्ञानिक मुक्ति के आंदोलन को सबसे ज्यादा ताकत से उभारना होगा। बहुजनों की राजनीतिक विजय के कुछ उदाहरण हम देख चुके हैं। वे दस पंद्रह सालों के क्षणिक जीवन मे कुछ छोटी मोटी उपलब्धियां हासिल करके फिर न जाने कहाँ खो जाते हैं। उत्तर और दक्षिण भारत मे बहुजन या ओबीसी राजनीति की क्षणिक सफलता के बाद आए एक गहरे निर्वात को ध्यान से देखिए आप समझ सकेंगे कि जब तक राजनीतिक बदलाव की प्रष्ठभूमि स्वरूप सामाजिक धार्मिक सांस्कृतिक बदलाव मौजूद नहीं होगा तब तक राजनीतिक बदलाव भी एक फफूंद की उगेगा और राजनीतिक अवसरवाद की हवा मे उड़कर खत्म हो जाएगा।  

बहुजनों की असली विजय या पराजय राजनीतिक या आर्थिक नहीं है वह सामाजिक धार्मिक और सांस्कृतिक है। जब तक इस आयाम पर देश भर मे संगठित पहल नहीं होगी भारत के बहुजनों के सबसे सफल नेता, आंदोलन और विचारधाराएं बार बार वेद वेदान्त के ग्रेंड नेरेटिव के दलदल मे घसीटकर फेंक दी जाएंगी। भारत के बहुजनो को समझना चाहिए कि बहुजन मुक्ति की असली लड़ाई राजनीति या सत्ता के जरिए नहीं बल्कि संस्कृति धर्म और कर्मकांडों के जरिए लड़ी जानी है। जब तक बहुजनों के घरों मे प्राचीन शोषक धर्म की कथाएं, देवी देवता व्रत उत्सव और त्योहार जिंदा हैं उनके जीवन मे कोई बदलाव नहीं आने वाला है। 

डॉ अंबेडकर ने जीवन भर बहुत सारे प्रयोग किये। उन्होंने अहिंसक सत्याग्रह और सामाजिक बदलाव आंदोलन के साथ कानून, संविधान और राजनीति के जरिए बदलाव का भी प्रयोग किया। लेकिन वे बहुत सावधानी से यह देख रहे थे कि अहिंसक सत्याग्रह की सफलता फिर से अहिंसा की सफलता बनकर वेद वेदान्त के ग्रेंड नेरेटिव मे उलझ मरेगी। विवेकानंद और गांधी द्वारा दिए गए नए लिबरल हिंदुइज़्म की खोल मे अहिंसक सत्याग्रहों की सफलता आसानी से अपहरण कर ली जाती है। ये सफलता वंचित लोगों की शक्ति की सफलता न बनकर ‘सत्याग्रह’ की सफलता बन जाती है जिसमे सत्य ही नहीं बल्कि हिंसा और अहिंसा की व्याख्या का अंतिम अधिकार फिर से आर्य ब्राह्मणों और उनके शास्त्रों के हाथों मे चला जाता है। कानून और संविधान के जरिए भी डॉ अंबेडकर ने बदलाव करके देखा लेकिन वे समझ गए कि कानून और संविधान भी धर्म के ग्रेंड नेरेटिव से, धर्म द्वारा बनाई गई कहानियों और पुराणों की ताकत से टक्कर नहीं ले सकते। 

इसीलिए सारे प्रयास करके डॉ अंबेडकर अंतिम रूप से धर्म के ग्रेंड नेरेटिव को ही बदलने का निर्णय लेते हैं। अंत मे सब कुछ कर लेने के बाद वे स्वयं बुद्ध के धर्म मे प्रवेश करते हैं और प्राचीन बौद्ध धर्म को नवयान के रूप मे निर्मित करने का कठिन और महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट शुरू करते हैं। उनके इस प्रयोग की सफलता के बारे मे अधिकांश बहुजनो को जानकारी नहीं है। यह भारत के बहुजनों का दुर्भाग्य है। यह भारत के बहुजन चिंतकों और बुद्धिजीवियों की असफलता है। भारत के नव-बौद्ध समुदाय पर देश विदेश मे हजारों रिसर्च हुई हैं और अधिकांश अध्ययन यह बताते हैं है इन नव-बौद्धों मे निर्णायक रूप से बदलाव आया है। इन नव-बौद्धों मे न सिर्फ प्राचीन शोषक धर्म का सम्मोहन खत्म हुआ है बल्कि इनकी जीवन शैली, शिक्षा रोजगार और उद्योग व्यापार के ढंग मे भी गहरा बदलाव आ चुका है। यह डॉ अंबेडकर की और नवयान-बौद्ध धर्म की सफलता है। इस सफलता का तेजी से प्रचार होना चाहिए। भारत के बहुजनों के लिए इसका एक खास मतलब है। डॉ अंबेडकर ने अपने अंतिम निर्णय मे प्राचीन शोषक धर्म को त्यागकर एक नए धर्म को चुना था। भारत के बहुजनों को यह बात बहुत ध्यान से नोट करनी चाहिए। डॉ अंबेडकर का अंतिम निर्णय हमारा पहला निर्णय होना चाहिए। 

एक उदाहरण से समझिए, अगर न्यूटन के बाद आइंस्टीन अपने से पहले हुए वैज्ञानिकों के सभी निर्णयों के प्रति अनजान रहते हुए या उन्हे पूरी तरह नकारकर फिर से ग्रेविटी की खोज करने निकल पड़ते तो वे रिलेटीवीटि की खोज नहीं कर पाते। आइंस्टीन ने न्यूटन की खोजों का और उनके निर्णयों का समग्रता से अध्ययन किया। उन्होंने न्यूटन के निर्णयों का गंभीरता से अध्ययन किया और फिर उसमे कमियाँ खोजते हुए भविष्य के विज्ञान को जन्म दिया। इसी तरह आज के बहुजन समाज को अपने न्यूटन अर्थात डॉ अंबेडकर की अंतिम खोजों और निर्णयों को अमल मे लाना होगा। उन निर्णयों पर अमल करते हुए धीरे धीरे पता चलता है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों मे समाज और संस्कृति मे क्या बदलाव करना है। इस समझ से भविष्य के धर्म का जन्म होता है। यह भारत के ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजाति श्रेणियों मे आने वाले सभी समुदायों को करना होगा। इन सभी श्रणीयों के लोगों को प्राचीन शोषक धर्म से मुक्त होने के क्रम मे अपनी अपनी मूल परंपराओं की खोज को तेजी से आगे बढ़ाना होगा। प्राचीन भारत ही नहीं बल्कि मध्यकाल और आधुनिक भारत मे भी वैदिक या वेदांतिक परंपराओं के समानांतर बहुजनों की सैकड़ों परम्पराएं रही हैं। उन सब परंपराओं को इतिहास की धुंध से बाहर निकालकर अगली पीढ़ी को सौंपना होगा। इसी मे भारत के बहुजनों का और लोकतान्त्रिक भारत के सुरक्षित भविष्य का आश्वासन छुपा हुआ है।

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संजय श्रमण जोठे लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

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