योगेश भागवतकर (Yogesh Bhagwatkar)
दोस्तों, ‘फुले’ फिल्म इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। कई लोग इस फिल्म की तारीफ कर रहे हैं। तकनीकी रूप से फिल्म वाकई शानदार बनी है। लेकिन कोई भी फिल्म सिर्फ तकनीकी पहलुओं के लिए नहीं देखता; उसमें फिल्म की कहानी, पटकथा, किरदार व् संवाद जैसी चीजें महत्वपूर्ण होती हैं, जो हमें प्रभावित करती हैं। अगर फिल्म ऐतिहासिक हो या किसी महापुरुष पर आधारित हो, तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। आखिर फिल्म दिखाना क्या चाहती है? इसका उद्देश्य क्या है? इतिहास को दृष्टिकोण से देखा गया है? कहीं सत्य को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है? क्या इसमें भ्रामक, गलतफहमी फैलाने वाली बातें हैं? ऐतिहासिक तथ्यों को अपनी सुविधा दृष्टि से प्रभावहीन करके कुछ की अतिशयोक्ति करके ब्राह्मणवादी छिपे मंसूबों को बोया गया है? इन सभी पहलुओं को सजगता से देखना जरूरी है।
‘फुले’ फिल्म रिलीज से पहले ही विवादों में घिर गई थी। सेंसर बोर्ड की अड़चनों से लेकर ब्राह्मण समाज के कथित अपमान के आरोपों तक, इस फिल्म को लेके बहुजन समाज में तीव्र प्रतिक्रियाएं आईं लेकिन फिल्म देखने के बाद एक बात साफ होती है कि यह फिल्म फुले के क्रांतिकारी कार्यों और विचारों को उजागर करने के बजाय सूक्ष्म रूप से उनकी बदनामी करने की कोशिश करती है। मेरा दृढ़ मत है कि यह फिल्म ब्राह्मणवादी मानसिकता के मंसूबों को आगे बढ़ाने का एक सुनियोजित प्रयास है, जिसमें फुले को अंग्रेजों का पक्षधर, कमज़ोर और वैचारिक रूप से प्रभावहीन दिखाया गया है। यह लेख ‘फुले’ फिल्म का वैचारिक दृष्टिकोण से आलोचनात्मक विश्लेषण कर बहुजन महापुरुषों के चरित्र हनन के ब्राह्मणी षड्यंत्र को उजागर करने का छोटा-सा प्रयास है।

महात्मा ज्योतिराव फुले आधुनिक युग में शोषित बहुजन समाज के सशक्तिकरण के पहले क्रांतिकारी विचारक थे। उन्होंने ब्राह्मणवादी सत्ता संरचना के आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक-सांस्कृतिक वर्चस्व को सीधे चुनौती दी। ‘गुलामगिरी’, ‘शेतकऱ्याचा आसूड’ जैसी उनकी किताबों ने शोषण की व्यवस्था की जड़ें उजागर कीं। “सत्यशोधक समाज” की स्थापना कर उन्होंने एकेश्वरवादी सार्वजनिक सत्यधर्म की नींव रखी, जिसने हिंदू ब्राह्मणी धर्म की सत्तासंरचना को जोरदार झटका दिया। छत्रपती शिवाजी महाराज की समाधि की खोज और “शिवाजी जयंती मनाने की शुरुआत” जैसे कार्यों से उन्होंने बहुजन समाज को ऐतिहासिक प्रेरणा देने का प्रयास किया। सावित्रीबाई फुले के साथ उन्होंने स्त्री शिक्षा और दलित-बहुजन उत्थान के लिए अथक संघर्ष किया। लेकिन ‘फुले’ फिल्म इस क्रांतिकारी विरासत को धुंधला करती है और फुले की एक अलग ही छवि प्रगट करती है।
‘फुले’ फिल्म का समग्र टोन उदासीन है। जोतिराव फुले कभी उत्साहित या प्रेरणादायी नहीं दिखते। प्रतीक गांधी को जैसे निर्देश मिले हों कि पूरी फिल्म में मुंह लटकाकर ही चलना है। इसका असर उनके अभिनय पर भी पड़ता दिखता है जो निराशा और हताश करता है। फुले का वह तेजस्वी व्यक्तित्व, जो ब्राह्मणवादी व्यवस्था को चुनौती देता था, फिल्म में पूरी तरह गायब है। इसके विपरीत, फुले को कमज़ोर और परिस्थितियों के सामने असहाय दिखाया गया है। खास बात यह है कि छोटे-मोटे रोल वाले ब्राह्मणों को प्रभावशाली और आत्मविश्वास से भरा दिखाया गया है। फिल्म के संवाद और दृश्य बेहद बचकाने, भ्रमित करने वाले और गलतफहमी पैदा करने वाले हैं।
… फिल्म की शुरुआत में डिस्क्लेमर दिखाया गया है, जिसमें कहा गया है कि यह फिल्म गहन अध्ययन के बाद बनाई गई है। अब इस “गहन अध्ययन” को देखते हैं।
प्रसंग पहला
भिडे कहता है, “जोतिबा, ब्राह्मण समाज इसके विरोध में है…” इस पर जोतिबा कहते हैं, “जानता हूँ, और आप ब्राह्मण होते हुए भी हमारी इतनी मदद कर रहे हैं!” शुरूआत में ही ब्राह्मणों को सुरक्षित कर लिया गया। ब्राह्मणों द्वारा व्यक्तिगत या व्यावहारिक कारणों से की गई मदद को भी बहुत बढ़-चढ़कर दिखाया जाता है, जो इस फिल्म में भी देखने को मिलता है।
प्रसंग दूसरा
एक जगह जोतिबा कहते हैं, “श्री गणेश के लिए पाँच पर्याप्त हैं।” श्री गणेशा याने आरंभ, एक मराठी उक्ति है… जिसे शुरुआत करना , आरंभ करना ऐसा अर्थ प्रकट होता है. जिसे ब्राह्मण लोग अपने बोलचाल की भाषा में इस्तेमाल करते हैं।
और इसी तरह, सावित्रीबाई कहती हैं, “हिंदू धर्म में स्त्री को दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती कहा गया है… ज्ञान अर्जन का अधिकार सिर्फ पुरुषों का होता, तो भगवान सरस्वती माँ को ज्ञान की देवी नहीं बनाते!” यह बचकाने डायलॉग है, जो फुले के सत्यशोधकी विचारों के पूरी तरह विपरीत है। फुले ने सभी ब्राह्मणी हिंदू धर्मग्रंथों को पाखंड कहा था। इतना ही नहीं, उन्होंने पुराणों के परशुराम, गणपति, वामन जैसे पात्रों का खुलकर मज़ाक उड़ाया था और वेद के पुरुषसूक्त का उदाहरण देकर पूछा था, “ब्राह्मण मुख से कैसे पैदा होते हैं? प्रात्यक्ष दिखाओ!” कहकर पीछे पड़ गए थे, जिससे पुणे के ब्राह्मण परेशान हो उठे थे। लेकिन ये बातें फिल्म के तथाकथित “गहन अध्ययन” से शायद छूट गईं होंगी।

प्रसंग तीसरा
एक दृश्य में अंग्रेज अधिकारी रीप फुले को ईसाई धर्म अपनाने का प्रस्ताव देता है और तुरंत कहता है, “ब्रिटिश कंपनी एक कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट शुरू कर रही है। इसके लिए कॉन्ट्रैक्टर के तौर पर मैंने तुम्हारा नाम सुझाया है।” इस पर फुले “थैंक्यू” कहते हैं और घर जाकर सावित्रीबाई उन पर नाराज होती हैं। फुले कहते हैं, “अंग्रेज कॉन्ट्रैक्ट दे रहे हैं, मैं ले रहा हूँ। मुझे पता है अंग्रेज लूटने आए हैं।” और वही वो बात खत्म कर दी जाती है। यह दृश्य ऐसा रचा गया है कि फुले जैसे ज़ोन अंग्रेज़ों द्वारा दिए लालच में फंस गए हों। इससे फुले के स्वायत्त क्रांतिकारी व्यक्तित्व को संदिग्ध बनाया जाता है। फुले को ब्रिटिश सरकार से मिली मदद कोई लेन-देन का सौदा नहीं था, बल्कि उनके कार्य की प्रशासनिक मान्यता थी। लेकिन फिल्म में उनके पूरे कार्य को अप्रत्यक्ष रूप से ब्रिटिशों की कृपा पर निर्भर दिखाया जाता है।
प्रसंग चौथा : ब्राह्मणी इच्छा अनुरूप गढ़ा गया किरदार – लहुजी सालवे
पुणे की मुख्य व्यापार लाइन में कुछ युवक ढोल पीटते हुए कहते हैं, “दोस्तों, सुनो-सुनो-सुनो, जो युवा देश के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेना चाहते हैं, उन्हें जीवनभर व्यायामशाला की सुविधा मुफ्त मिलेगी।”
“लहुजी सालवे स्वयं उन्हें युद्ध कला का प्रशिक्षण देंगे…” और “सभी जातियों में उनका दबदबा है।” जैसे वाक्य क्या लहुजी सालवे का यह किरदार वाकई ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है? एक तरफ कमर में झाड़ू और गले में मटका बांधे अछूतो को दिखाया जाता हैं, और दूसरी तरफ लहुजी को ताकतवर, उस समय का कोई बड़ा प्रभावशाली व्यक्ति दिखाया गया है। कितना विरोधाभास है।
आगे तो और कहर कर दिया। जब जोतिराव फुले लहुजी सालवे से मिलते हैं और गोविंदराव फुले के बेटे के रूप में अपनी पहचान बताते हैं, तो लहुजी उनकी गर्दन पकड़कर उन्हें ज़मीन पर पटक देते हैं और उनकी जांघ पर पैर रखकर कहते हैं, “अंग्रेजों के दलाल! उनका साथ दे रहे हो, जो इस देश को गुलाम बनाना चाहते हैं!” यह फिल्म का सबसे बड़ा ब्राह्मणी षड्यंत्र है। यहाँ लहुजी सालवे के जरिए ब्राह्मणी आरोपों को थोपने की कोशिश की गई है। वे लहुजी के जरिए अपनी मन की बात कहलवाते नज़र आ रहे हैं। इस घटना से वे यह दिखाना चाहते हैं कि गोविंदराव फुले का बेटा जोतिराव फुले अंग्रेज़ों की दलाली करता था यह बात जैसे सर्वमान्य थी। यह एक कुटिल चाल है! लेकिन जोतिराव पर ऐसे आरोप केवल ब्राह्मणी खेमे तक सीमित थे, तब भी और आज भी। और केवल उसको पुष्टि देने के लिए यह प्रसंग चित्रित किया गया है!

कमाल देखिए, इस बात को दिखाने के लिए उन्होंने लहुजी सालवे जैसे इतिहास में नगण्य जानकारी वाले किरदार को कितना बड़ा कर दिया। जबकि लहुजी सालवे के बारे में इतिहास में कोई सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन उस समय की ऐतिहासिक-सामाजिक स्थिति को समझने वालों को यह तुरंत समझ आ जाता है। लहुजी सालवे “मांग” जाति से थे, एक अछूत जाति से। वह भयानक छुआछूत वाला दौर था। क्या लहुजी सालवे को छुआछूत से छूट मिली थी? जहाँ दलितों की छाया भी सवर्णों को स्वीकार्य नहीं थी, वहाँ इस दलित जाति के लहुजी सालवे के पास युद्ध प्रशिक्षण लेने कौई आता होगा? क्या समाज अचानक लहुजी के लिए उदार हो गया था? जब उनकी अपनी खुद की जाति और जातीसमूह को स्वदेशी स्वधर्मी लोगों से कुत्ते-बिल्लियों से भी बदतर व्यवहार मिल रहा था, उनके नैसर्गिक मानवीय अधिकार तक छीन छीन ले गए थे, तब इसके खिलाफ कुछ करने के बजाय लहुजी को अंग्रेज़ों से लड़ने का जुनून कैसे चढ़ा होगा? लहुजी कहते हैं, “ये अंग्रेज बहुत धूर्त प्राणी हैं… जरूर इसमें उनकी कोई चाल होगी!” यानी फुले को नहीं समझ आता, लेकिन अनपढ़ लहुजी को समझ आता है?
और भी हास्यास्पद बात यह है कि फुले माली जाति से होने के बावजूद ब्राह्मणों को उनकी छाया का विटाळ (अपवित्रता) दिखाया जाता है, लेकिन अछूत लहुजी सालवे का नहीं।
(लहुजी सालवे का किरदार ठीक उसी तरह आप समज सकते है जैसे उत्तर भारत में भंगी जाति के लोगों में वाल्मीकि नाम का किरदार गढ़ा गया और उसका इस्तेमाल उस जाति में जातीय अस्मिता का निर्माण कर ब्राह्मणी धर्म से जोड़े रखना एवं अंबेडकरराइट मूवमेंट से उन्हें अलग करने की कोशिश करता है)
‘सत्यशोधक’ मराठी फिल्म में भी यही किया गया था। यानी पुणे के ब्राह्मणों द्वारा इस्तेमाल किया गया यह फॉर्मूला हिंदी भाषी ब्राह्मणों तक सटीक पहुँचाया गया। क्या गजब का लेन-देन है इनके बीच! सिनेमैटिक लिबर्टी के नाम पर इतिहास के साथ ऐसा खिलवाड़ क्या ब्राह्मणी विकृति नहीं है?
प्रसंग पाँचवाँ
सावित्रीबाई का फिल्म में डायलॉग, “सत्यशोधक समाज का सबसे बड़ा उद्देश्य रहेगा कि किसी को शूद्र नहीं, दलित कहा जाए!” क्या मज़ाक है!
यह गलतफहमी पैदा करता है। पहचान के तौर पर यह शूद्र और दलित को एक दिखाता है, ज्योतिबा फुले शूद्र और अतिशूद्र जैसे शब्दों का प्रयोग करते थे। शूद्र याने आज के OBC और अतिशूद्र (आज के दलित/अनुसूचित जाति) अलग समूह है। उस काल में ‘दलित’ शब्द प्रचलित भी नहीं था, फिर भी इसे फिल्म में जबरदस्ती डाला गया। फिल्म में इन दोनों की सामाजिक स्थिति को इतना मिलाया गया कि शूद्र और दलित का भेद समझना मुश्किल है। क्या लेखक-निर्देशक जानबूझकर OBC के ऐतिहासिक शोषण को भुलवाकर आज के सामाजिक-राजनीतिक षड्यंत्रों से उन्हें अनजान रखना चाहते हैं? यह सब तब, जब फिल्म गहरे अध्ययन का दावा करती है।
फिल्म में फुले के कई महत्वपूर्ण कार्यों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया गया है। ‘शेतकऱ्याचा आसूड’, फुले का सर्वोच्च लेखन, जिसमें उन्होंने धर्म-संस्कृति और अर्थव्यवस्था के आधार पर शोषण का समग्र विश्लेषण किया, इसका फिल्म में जिक्र तक नहीं है। जोतिराव फुले के जीवन और सत्यशोधक समाज की स्थापना में बहुजन सहयोगियों के योगदान को दिखाने के बजाय शुरुआती ब्राह्मण सहयोगी बार-बार दिखाते हैं। विभिन्न जाति के बहुजन साथियों को तो नाम मात्र के लिए भी नहीं दिखाया गया।
छत्रपती शिवाजी महाराज की समाधि की खोज और जयंती की शुरुआत, सावित्रीबाई के ‘काव्यफुले’ कविता संग्रह का कोई उल्लेख नहीं है। हिंदू ब्राह्मणी धर्म की आलोचना, जो फुले के विचारों का मूल थी, वह फिल्म में कहीं पर भी नज़र नहीं आती।
फिल्म में कई ब्राह्मणवादी संवाद भी प्रमुख हैं। ऐसे संवाद और दृश्य ब्राह्मणवादी आरोपों को बल देते हैं, लेकिन फुले के सत्य विचारों को दबाया जाता है, क्योंकि वे आज के ब्राह्मणों की “भावनाओं को ठेस पहुंचाएंगे।
प्रसंग छठा
सावित्रीबाई के मुख से एक वाक्य है, “भारत में पहली बार किसी को महात्मा की उपाधि मिली है, जो ब्राह्मण नहीं है।” यह क्या मूर्खता है? जोतिराव से पहले किस ब्राह्मण को ‘महात्मा’ की उपाधि मिली थी? किसी भी ब्राह्मण को नहीं। फिर ऐसा डायलॉग क्यों? यह डायलॉग फुले की “महात्मा” उपाधि की गरिमा को कम करने की कोशिश है। और इन्होंने गहन अध्ययन किया है, ऐसा दावा करते हैं! कमाल है!!
सेंसर बोर्ड और सस्ती पब्लिसिटी
रिलीज से पहले फिल्म को सेंसर बोर्ड से अड़चनें और कुछ ब्राह्मणी संगठनों का विरोध सस्ती पब्लिसिटी का हिस्सा था। कोई प्रतिष्ठित ब्राह्मणी व्यक्ति/संगठन इसके खिलाफ नहीं आया, इससे इस विरोध के उथले इरादे उजागर होते हैं। इस नाटकीय विरोध पर बहुजन समाज ने तीव्र प्रतिक्रिया दी और फिल्म को बिना कट्स के रिलीज करने की माँग की, जिसे डॉ. प्रकाश आंबेडकर जीं ने भी समर्थन दिया। लेकिन फिल्म देखने के बाद लगता है कि यह विवाद पैदा कर फिल्म को प्रचार दिलाने की चाल थी।
‘फुले’ फिल्म महात्मा ज्योतिराव फुले की क्रांतिकारी विरासत का अपमान करती है। फुले को उनके स्कूल में घुसकर कुछ ब्राह्मणों द्वारा मारपीट करते दिखाया गया है। ऐसी कोई भी घटना फुले जी के जीवन में नहीं घटी। फुले शारीरिक रूप से मजबूत और लड़ाकू स्वभाव के थे। साथ ही, जब ब्राह्मण द्वारा पैसा देकर भेजे गए हमलावर जोतीराव फुले जी को मारने आते हैं , वह सीन जल्दी में खत्म कर दिया गया। यहाँ निर्देशक अनंत महादेवन को अपनी सिनेमैटिक लिबर्टी का इस्तेमाल सूझा नहीं। यहां तो लिबर्टी की ज़रूरत भी नहीं थी। फुले वास्तविक जीवन में एक फाइटर एक पहलवान आदमी थे। रियल सुपरहीरो! उनके जीवन में इतना सिनेमैटिक मटेरियल भरा है कि बाहर से कुछ डालने की ज़रूरत ही नहीं थी लेकिन अगर फिल्म का उद्देश्य ही वह नहीं है, तो वे इसे कैसे दिखाएंगे?
फूलेजी के स्कूल की एक लड़की मुक्ता सालवे, जो अपनी ‘महार मांगों की दशा’ निबंध के लिए प्रसिद्ध हैं, को फिल्म में इतनी छोटी बच्ची दिखाया गया कि उनके लेखन पर ही शंका उठे। निबंध की चार पंक्तियां भी स्पष्ट नहीं दिखाई गईं। उस दौर की एक किशोरवयीन दलित लड़की के विचारों को दिखाने से कितना रोमांचक दृश्य बन सकता था। लेकिन दो अधूरी पंक्तियों पर बात खत्म कर दी गई। इतनी छोटी सी क्रांतिकारी कृति से भी वे डर गए। इससे साफ दिखता है कि ब्राह्मणी हितों की रक्षा के लिए कितनी सावधानी बरती गई, ताकि आज की ब्राह्मणी व्यवस्था को इस फिल्म से जरा भी ठेस न पहुंचे, एक चिंगारी भी इसके खिलाफ न भड़के।
फिल्म निर्माता “गहन अध्ययन” का दावा करते हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि पुणे के चार सनातनी ब्राह्मणों ने स्क्रिप्ट लिखी और तथाकथित प्रगतिशील ब्राह्मण अनंत महादेवन ने उसे हिंदी में जस का तस अनुवाद कर इस्तेमाल किया। एक तरह से कह सकते हैं कि यह फिल्म आज के ब्राह्मणी परिप्रेक्ष्य से बनाई गई है, जिसमें क्रांतिबा फुले के क्रांतिकारी तत्व ही गायब हैं।
देखिए, ऐतिहासिक महापुरुषों का “जीवनचरित्र” और उन पर बनी फिल्में समाजशास्त्रीय प्रात्यक्षिक होती हैं, लोकशिक्षण होती हैं। शोषित वर्ग के लिए यह एक बड़ी पूंजी होती है। लेकिन अगर शोषक वर्ग ही इसे पेश कर रहा हो, तो उनके इरादों की जांच जरूरी है। केवल भावनाओं में बहकर फिल्म देखने के बजाय इसे संदेह की नज़र से देखना चाहिए। ‘फुले’ फिल्म देखकर तो यह और भी जरूरी लगता है। बहुजन समाज को महात्म जोतीराव फुले के विचारों को सामने लाकर फिल्म निर्माताओं के कपटी इरादों को नाकाम करना चाहिए और ऐसी कृतियों से सावधान रहना चाहिए।- योगेश भागवतकर
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(उपरोक्त लेख मराठी आरटीआय के लिए लिखा गया था जिसका यह हिंदी अनुवाद है। )
लेखक नागपूर के निवासी हैं और उनकी शिक्षा बीए (अंग्रेजी साहित्य) है। उनसे yogee144@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.
उनका संपर्क नंबर 9637975823 है।
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