मानसिक स्वास्थ्य का दाग़ और एक ब्राह्मण परिवार का अनुभव

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अंकिता चैटर्जी (Ankita Chatterjee)

मेरे पिताजी जी एक मानसिक रोग से पीड़ित थे जिसके बारे में मैं अपनी युवावस्था में तो कभी नहीं बता सकती थी। मैंने अपनी माँ का तनावग्रस्त चेहरा देखा था, जब वह पिता के साथ जो हो रहा था, उसे जानने-समझने के लिए एक मनोचिकित्सक से दूसरे मनोचिकित्सक के पास दौड़ रही थीं। मेरी माँ, जो एक ग्रेजुएट थीं, उनकी शादी इस उम्मीद के साथ कर दी गई थी कि उनके पति उनकी ज़रूरतों का ख्याल रखेंगे। लेकिन स्थिति उलट गई। मेरी माँ पर लगातार आरोप लगने लगे कि उन्होंने अपने पति का मानसिक स्वास्थ्य ख़राब किया है। वह बस अपने पति और बेटियों की एकमात्र देखभाल करने वाली बन के रह गईं। 1990 के दशक में, दो ऐसी छोटी बेटियों की माँ होने के नाते, जो अभी भी अपनी प्रारंभिक अवस्था में ही थीं, वह अपनी बेटियों को नहीं छोड़ सकती थीं।

मेरे पिता की बीमारी ने एक ब्राह्मण परिवार में अर्ध-बहिष्कृत होने का अर्थ परिभाषित कर दिया। इस नवउदारवादी युग में, एक ब्राह्मण परिवार में, प्रतिष्ठा और सम्मान व्यक्ति के व्यवसाय से जुड़े होते थे, और सम्मान जातिगत स्थिति से। मेरे पिता अपनी मानसिक बीमारी का पता चलने से पहले एक सरकारी कर्मचारी थे। मनोरोग दवाओं की भारी खुराक के कारण उनका काम और पदोन्नति पर बुरा असर पड़ा। किसी व्यक्ति की कामकाजी हेसियत उसके अपने कर्तव्य निभाने और परिवार की देखभाल करने के व्यक्तिगत गुणों से जुड़ी होती है। उसमें वे असफल रहे क्योंकि कार्यालय की संरचना एक स्वस्थ शरीर वाले व्यक्ति पर आधारित थी, जिसे कोई मानसिक स्वास्थ्य समस्या न हो। सिज़ोफ्रेनिया उनकी पहचान से गहराई से जुड़ गया। एक विशेषता जिसने उन्हें सुरक्षित रखा, वह थी ब्राह्मण पुरुष होने की उनकी जातिगत स्थिति।

बचपन में मेरा मन पिताजी के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े दाग़ से कई तरह से जूझता था। यह मेरी माँ द्वारा मेरे पिता के व्यवहार पर लगातार नज़र रखने और सामाजिक आयोजनों में उन्हें नियंत्रित करने की कोशिशों में भी झलकता था। मुझे याद है कि मेरे दादा-दादी, चाचा-चाची शुरुआत में हमें किसी भी सामाजिक समारोह में आमंत्रित नहीं करते थे, क्योंकि मेरे पिता पूरे परिवार के लिए बेइज्जती का कारण बन जाते। मनोचिकित्सक दवाइयों की बस भारी खुराक लिखते थे और व्यक्ति के जीवन-चरित्र और अनुभवों पर कभी ध्यान नहीं देते थे। थेरेपी (therapy) तो एक दूर की बात थी, और 1990 के दशक में महानगर कोलकाता में मनोचिकित्सक भी इस बारे में अनभिज्ञ थे। मेरे पिता का मानसिक स्वास्थ्य एक ऐसी चीज़ थी जिसे छिपाया जा सकता था। मैं अक्सर अपने पिता की टेढ़ी-मेढ़ी उंगलियाँ देखती थी। भारी दवाइयों ने उँगलियों पर भी बुरा असर डाला था। बचपन में कई बार मैं उनकी उंगलियाँ सीधी करती, लेकिन वे फिर से टेढ़ी हो जातीं। मेरी माँ ने मुझे सख़्त हिदायत दी थी कि मैं स्कूल में अपने पिता की मानसिक स्वास्थ्य के बारे में किसी को कुछ न बताऊँ। माँ को डर था कि कहीं हम बहनों का पिता की बीमारी के चलते कोई निरादर न करे। मानसिक बीमारी को एक विकलांगता माना जाता था, और इसके बारे में पता चलने पर परिवार को शर्मिंदगी उठानी पड़ती थी। इससे पता चलता था कि परिवार आनुवंशिक रूप से उस अभिशाप से ग्रस्त था जो जन्म से ही उसे मिलता था, और लंबे समय तक मुझे लगता रहा कि हमारे परिवार में कुछ गड़बड़ है, और बचपन में, मैं इस कलंक को स्कूल और कॉलेज में भी किसी को न बताने के डर से अपने साथ लेकर चलती रही।

एक ब्राह्मण होने के चलते मेरे पिता को प्राप्त सुरक्षा

बाद में, जब मैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में आई, तो मुझे अस्पृश्यता (जाति प्रश्न) से जुड़े एक बड़े कलंक का एहसास हुआ, जो स्वभाव से ही जन्म-आधारित भी है। हालाँकि मेरे पिताजी के साथ भी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा एक दाग था, फिर भी वे एक सरकारी नौकरी में थे जो उन्हें उनके अपने पिता की सिफ़ारिश पर मिली थी। ब्राह्मण जाति से होने के कारण और पीढ़ियों से जुड़े होने के कारण उन्हें एक ऐसी नौकरी मिली जिसने हमारे भविष्य की रक्षा की और हमने एक अनिश्चित परिस्थिति में हमारी स्कूली शिक्षा पूरी की, जहाँ हमें हमेशा उनकी नौकरी छूटने का डर लगा रहता था। उनकी जातिगत स्थिति के कारण कुछ लोग उन्हें एक धर्मपरायण व्यक्ति के रूप में देखते थे, खासकर उनके उन सहयोगियों के बीच जो हिंदू धर्म की ब्राह्मण श्रेष्ठता में विश्वास करते थे। 19वीं सदी के पूजनीय भारतीय रहस्यवादी रामकृष्ण परमहंस, जिनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था और जिनके अनुयायी कई बंगाली थे, अक्सर विलक्षण व्यवहार प्रदर्शित करते थे, और इस व्यवहार का कारण था ईश्वर दर्शन पर उनकी दृष्टि। हालाँकि मेरे पिता को कभी-कभार अपने रिश्तेदारों और सहकर्मियों से अपमान और शिकायतें मिलती थीं, उनकी मानसिक स्थिति के कारण उन्हें अयोग्य माना जाता था। उनके माता-पिता का मानना ​​था कि अगर उनका दिमाग़ ठीक होता, तो वे अच्छा काम करते, क्योंकि वे ब्राह्मणों की उच्च जाति से थे, जो अपनी बौद्धिकता और रचनात्मकता के लिए जाने जाते हैं। इसने मुझे जीवन में आगे चलकर यह सवाल करने पर मजबूर किया कि अगर मेरे पिता किसी उत्पीड़ित वर्ग से होते तो क्या होता? यह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में मेरे लंबे प्रवास का नतीजा था, जहाँ एक समतावादी विश्वविद्यालय में भी, हाशिए पर पड़े समूहों के उत्पीड़न को मुखर करने और उनके अधिकारों को आगे बढ़ाने के लिए आंबेडकरवादी राजनीति एक सशक्त मंच के रूप में उभरी। मैं अक्सर सोचती थी, अगर हाशिए पर पड़ी जातियों से आने वाले किसी पहली पीढ़ी के छात्र को मेरे पिता जैसी ही मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ होतीं, तो क्या उन्हें आसपास के लोगों से सहयोग और मदद मिलती, या उसे यह एहसास होता कि मानसिक स्वास्थ्य समस्या के लिए मनोचिकित्सा उपचार और परामर्श की ज़रूरत होती है, जो कि काफी महँगा मामला है?

हाशिये पर मानसिक स्वास्थ्य

आमतौर पर इस दुनिया को शक्ति, प्रदर्शन और उत्पादन की दुनिया के रूप में देखा जाता है, जहां दलित बहुजन और आदिवासी अपनी हाशिए की पहचान से जुड़ी अक्षमता के कारण नज़र में ज्यादा रहते हैं। मानसिक स्वास्थ्य को अक्सर एक मध्यम वर्गीय समस्या कहा जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि हाशिये पर पड़े लोगों को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ नहीं होतीं, बल्कि उनकी पहचान और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जुड़े कलंक का जाल पूंजीवाद की अति-उत्पादकता से भी कहीं अधिक जटिल हो जाता है, जहाँ उन्हें अपने खिलाफ खड़ी संस्थागत संरचनाओं और नीतियों के सामने अपनी योग्यता साबित करनी पड़ती है। इसलिए, मानसिक स्वास्थ्य मुद्दों को एक खास ढांचे से तय होने वाले कारणों के बारे में चर्चा करना आवश्यक है। हालाँकि परिवार से मिले आनुवंशिक गुण किसी व्यक्ति को मानसिक स्वास्थ्य की दिक़्क़तों की तरफ़ ले जा सकते हैं, लेकिन समाज में फैली असमानताएँ और पुरानी सोच (रूढ़ियाँ) इन दिक़्क़तों को और ज़्यादा बढ़ा देती हैं।

निष्कर्ष

आज, एक ब्राह्मण महिला होने के नाते, मैं अपनी स्वास्थ्य स्थिति और ऐसे प्रतिकूल माहौल में काम करने की अत्यधिक चिंता के कारण कुछ महीनों के लिए अवकाश ले सकती हूँ जहाँ प्रबंधकीय कार्यों के लिए शोध विचारों को दबा दिया जाता है और सत्ता के पदों पर आसीन प्रतिष्ठित लोगों के लिए छाया-लेखन को बढ़ावा दिया जाता है। एक विशेषाधिकार प्राप्त जाति से होने के नाते, मैं अभी भी घर पर रहकर अपने परिवार और दोस्तों से सहयोग ले  सकती हूँ। यहाँ मैं यह दिखाना चाहती हूँ कि कैसे मानसिक स्वास्थ्य विशेषाधिकार भी जातिगत संरचना में अंतर्निहित है, जहाँ हाशिए पर रहने वाले जाति समूहों को आज भी अच्छे रोज़गार के मौके नहीं मिलते और उनकी मानसिक सेहत पर भी बुरा असर पड़ता है। मेरे पिता आज भी इस बात पर गर्व करते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य समस्या के बाद भी, उन्होंने किसी तरह अपना जीवन जारी रखा और रुके नहीं। मैं उन्हें बताती हूँ कि यह जातिगत विशेषाधिकार के साथ आने वाली सामाजिक पूँजी और मेरी माँ द्वारा दिए गए अनगिनत त्याग और सेवाओं के कारण है। यह ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का परिणाम है, जहाँ महिलाओं की पहचान केवल उन सेवाओं तक सीमित थी जो वे निजी जीवन में प्रदान कर सकती थीं, जब वे आर्थिक रूप से निर्भर थीं और सामाजिक समर्थन कम था।

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डॉ. अंकिता चटर्जी ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से 2022 में पीएचडी पूरी की। उनका विषय समाजशास्त्र है।

नोट: लेखिका को स्वास्थ्य संबंधी जानकारी साझा करने के लिए अपने पिता से अनुमति प्राप्त है।

यह आलेख अंग्रेज़ी भाषा से अनुदित है. अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए इसे यहाँ क्लिक करें।

अनुवाद: गुरिंदर आज़ाद (Gurinder Azad)

 

 

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