भिक्खुनी विजया मैत्रीय (Bhikkhuni Vijaya Maitriya)
किताब का शीर्षक: नवयान दर्शन : बुद्ध की शिक्षाओं का आधुनिक विवेचन
लेखक: डॉ. रत्नेश कातुलकर
पृष्ठ संख्या: 264
प्रकाशक : नवयान-प्रकाशन, नासिक
मूल्य : 220 रुपये
सम्पर्क : navayanaprakashan@gmail.com, ratnesh.katulkar@gmail.com
बौद्ध धर्मावलम्बियों में वर्तमान समय में भारत के नवदीक्षित बौद्धों के परिप्रेक्ष्य में ‘नवयान बुद्धिज़्म’ या ‘नवयानी बौद्ध’ यह अवधारणा प्रचलित हो चुकी है। पारम्परिक बौद्धों द्वारा कभी-कभी यह शब्द उपहासात्मक रूप से भी आंबेडकरवादी बौद्धों के लिए प्रयोग किया जाता है। सोचनीय बात यह है कि भिक्षु-भिक्षुणी संघ भी इस बात से अछूता नहीं है; एक ही समाज से नवदीक्षित होकर भी दो वर्गों—परम्परावादी और आंबेडकरवादी—में वर्गीकरण किया जा रहा है। ऐसे में चिंतनशील लेखक रत्नेश जी ने इस विषय पर अपनी लेखनी को एक प्रकार से आंदोलित किया है, जो अत्यंत प्रासंगिक है।

तथागत बुद्ध ने कालाम सुत्त में कालामों से कहा था कि केवल परम्परा से चला आ रहा है, या केवल पिटकों में लिखा है इसलिए मत मानो, बल्कि उसे अपनी अनुभूति पर परखो, यह देखो कि वह अपने और बहुत से लोगों के हित में है या नहीं। यदि वह बात अनुभूति पर खरी उतरती है तथा लोकहित में है तो ही उसे स्वीकार करो। किंतु इस सुत्त की बहुत से जनों ने उपेक्षा ही की है, क्योंकि यह सुत्त बौद्ध पुरोहिताई और व्यक्ति पूजा में विघ्न उत्पन्न करता है।
उसी प्रकार, चुल्लवग्ग के 6.2 और 6.3 के अनुसार—झूठी विद्याओं को न पढ़ना, छींक आने पर ‘जीते रहो’ कहना जैसे मिथ्या विश्वासों को नकारने के लिए कहा गया है—फिर भी कई प्रकार के मिथ्या विश्वासों से परम्परावादी ग्रस्त नज़र आते हैं। विनय पिटक में दिए निदान के अनुसार उजाले में दिया जलाने की आवश्यकता नहीं है, कहने पर भी सूरज की रोशनी में और रात की बिजली की रोशनी में भी दिया जलाया जाता है। प्रतीक का बहाना करके अतार्किक कर्मकाण्ड को ढोने की आदत से मजबूर सुधारक बने फिरते हैं।
लेखक रत्नेश जी संस्कृत के विद्वान वेदाचार्य बुद्धघोष की भूमिका को संदिग्ध बताते हैं और लिखते हैं कि इन्हीं के कारण तिपिटक में अंधविश्वास के तमाम तत्व जैसे—पुनर्जन्म और पटिच्चसमुप्पाद जैसी तार्किक शिक्षा की अवैज्ञानिक अवधारणाएँ—शामिल हुईं, जो बौद्ध धम्म की स्थायी पहचान बन बैठी हैं। यह शंका बिल्कुल सत्य है। यह प्रमाणित है कि ईस्वी सन् पाँचवीं शताब्दी में बुद्धघोष लंका गए थे। वहाँ जाकर बुद्धघोष ने महामेन्द्र द्वारा लिखित (जो पहली, दूसरी और तीसरी संगीति में कही गई थीं, जिन्हें भन्ते महेन्द्र लंका ले गए थे) सिंहली अट्ठकथाओं को मागधी में लिखने के बाद, उन मूल सिंहली अट्ठकथाओं को महाचैत्य (सुवर्णमाली) के पास रखवा कर जला दिया था।¹

इतना बड़ा प्रमाण होने के बावजूद भी पालि अभ्यासक एवं विपस्सना साधक बुद्धघोष लिखित साहित्य पर अंधा विश्वास करते हैं—यह बड़े आश्चर्य की बात है।
बुद्ध के समय प्रचलित जैन विचारधारा को नकारते हुए बुद्ध ने वर्षा प्रवास के दौरान मौन व्रत धारण करने के लिए भिक्खुओं को फटकारते हुए कहा था, “मोघ (निकम्मे) पुरुषों ने मौन रहकर पशुओं की तरह ही एक साथ वास किया, भेड़ों की तरह वास किया, कैसे तीर्थिकों के मूक व्रत को ग्रहण किया। मूक व्रत जिसे तीर्थिक लोग ग्रहण करते हैं, नहीं करना चाहिए।”² यह बात बुद्ध ने भिक्खुओं के प्रत्यक्ष नैतिक व्यवहार पर ज़ोर देने के लिए कही थी।
स्पष्ट है कि जब एक से अधिक व्यक्ति सामूहिक रूप से मौन रहते हैं तो उनके नैतिक आचरण की जांच नहीं हो सकती। जैसे कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर कहते हैं कि अकेले व्यक्ति को धम्म की आवश्यकता नहीं, जब एक से अधिक होते हैं तब उन्हें धम्म को आचरण में लाना ज़रूरी हो जाता है। बुद्ध भिक्खुओं से भी संघ में सामाजिक नैतिकता की अपेक्षा करते हैं।
किन्तु बुद्ध के विचारों के विपरीत लोग ऐसा क्यों करते हैं? क्योंकि वह उन्हें सरल लगता है, बिल्कुल उस तपस्वी की तरह जो पहाड़ की चोटी पर अकेला बैठा तप करता है—उससे कोई शील भंग नहीं होता, लोग उसे महान, पहुँचा हुआ मानते हैं। किन्तु जैसे ही गाँव के मेले में जाता है, लोग उसे अनदेखा करते हैं, उसे पहचानते नहीं, धक्के मारकर निकल जाते हैं और उसका क्रोध जाग जाता है। असली परीक्षा में वह असफल हो जाता है।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने जो बुद्ध का धम्म प्रस्तुत किया है, वह इसी व्यवहारिकता को ध्यान में रखकर किया है। इसका अर्थ यह कतई नहीं कि तथागत बुद्ध का दृष्टिकोण सामाजिक व्यवहार पर ज़ोर नहीं देता। सच तो यह है कि बुद्ध की सम्पूर्ण शिक्षा सामाजिक दृष्टिकोण पर ही आधारित है, अन्यथा वे 45 वर्षों तक लोगों के बीच जाकर धम्म का प्रचार नहीं करते। अतः यह निष्कर्ष निकलता है कि बाबासाहेब द्वारा बताया गया बुद्ध का धम्म ही वास्तविक है, जिसे ‘नवयान’ कहा जा रहा है—वस्तुतः यह नवयान ही बुद्धयान है। लेखक ने इसी बात को बड़ी गहराई से स्पष्ट और सरल व्याख्या करते हुए समझाया है।

विद्वान लेखक रत्नेश ने इस ग्रंथ में बुद्ध की शिक्षाओं में प्रक्षिप्त अनेक विरोधाभासों को दूर करते हुए ‘नवयान’ को ही बुद्ध की सही शिक्षा प्रमाणित करने का सफल प्रयास किया है। अनीश्वरवाद, अनात्मवाद, पुनर्भव और अनित्यता नवयान के अनिवार्य तत्व हैं—इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती, किंतु लेखक ने इन विषयों को समझने के लिए मानसिक स्वतंत्रता को अत्यंत आवश्यक माना है।
वे लिखते हैं—संदेह के बिना कोई जांच और खोज नहीं होती और इनके बिना ज्ञान नहीं मिल सकता। बौद्ध धर्म में पुरोहिताई पर अंधश्रद्धा इतनी बढ़ गई है कि मैं यह पढ़कर हैरान रह गई कि भूटान में ‘कर्ममुद्रा’ नाम की एक यौगिक क्रिया प्रचलित है, जो अत्यंत अश्लील क्रिया हैं, जिसे वे ‘महासुख’कहते हैं। इसके लिए भिक्खुनियाँ भी खुशी से तैयार होती हैं। ऐसे कई उदाहरण लेखक ने दिए हैं। यह एक प्रकार की मानसिक गुलामी है जो केवल व्यक्तिगत ही नहीं, बल्कि समाज और सभी मानवमूल्यों को भारी नुकसान पहुँचाती है।
लेखक ने ‘चार अरिय सच्च’ पर बाबासाहेब द्वारा उठाए गए संदेह को बहुत ही सकारात्मक तरीके से स्पष्ट किया है। किस प्रकार इसकी प्रस्तुति करने पर लोग बुद्ध के धम्म को निराशावादी न मानकर आशावादी समझें—यह बहुत ही समाधानकारक विश्लेषण है। वहीं स्त्री विमर्श में महत्वपूर्ण भिक्खुनियों के ‘आठ गुरुधर्म’ पर चर्चा करते हुए उसकी वर्तमान प्रासंगिकता पर प्रश्न उठाया है तथा उनके पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है। एक पुरुष होते हुए निष्पक्ष सोच को रखना नवयान के पाठकों के लिए प्रेरक होगा।
स्त्री को “दो अंगुल की ज्ञाता” कहकर उपहास किया गया, लेकिन यह कमाल का ज्ञान है कि दो अंगुल से भात के दो दाने दबाकर स्त्री यह आसानी से बता देती है कि भात पका है या नहीं। ठीक उसी प्रकार लेखक रत्नेश ने अपने इस नवयान ग्रंथ में विषय के साथ पूरा न्याय किया है—जो बहुत प्रभावशाली है और पाठकों को चिंतन करने की सही दिशा देने वाला है—यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं हो रहा।
मैं साधुवाद के साथ आशा करती हूँ कि इसी तरह लेखक अपनी रचनाओं से समाज को सही दिशा देते रहें।
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भिक्खुनी विजया मैत्रीय महाप्रजापति गौतमी एजुकेशनल फ़ाउंडेशन की निदेशक हैं।
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