अच्छेलाल प्रजापति (Achchhelal Prajapati)
भारत में जाति सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संरचना का एक केंद्रीय तत्व रही है, जो संसाधनों के वितरण और सामाजिक असमानताओं को गहराई से प्रभावित करती है। केंद्र सरकार ने जनगणना में जातिगत आंकड़े शामिल करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है, जिसकी माँग का एक लम्बा इतिहास रहा है, जिससे सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठा है। हालांकि, केवल जातिगत आंकड़े एकत्र करना पर्याप्त नहीं है। जाति और संसाधनों के बीच संबंध को समझने के लिए जनगणना में संसाधन गणना (आर्थिक स्थिति, संपत्ति, आय, और अन्य संसाधनों का आकलन) को भी शामिल करना आवश्यक है। आइये हम समझते है कि जाति जनगणना आंकड़े सामाजिक न्याय के लिए पर्याप्त क्यों नहीं हैं। साथ ही हम इसके महत्व, और इससे उत्पन्न होने वाली संभावनाओं और चुनौतियों पर भी विचार करेंगे।
भारत में जाति व्यवस्था ने ऐतिहासिक रूप से संसाधनों के वितरण को नियंत्रित किया है। यह सर्वविदित है कि पारंपरिक रूप से, उच्च जातियों (सवर्ण जातियाँ जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, और वैश्य) ने भूमि, शिक्षा, और सत्ता पर अधिक नियंत्रण रखा जबकि निम्न जातियाँ (अनुसूचित जाति, जनजाति, और अन्य पिछड़ा वर्ग) इन संसाधनों से वंचित रहीं। औपनिवेशिक काल में, ब्रिटिश सरकार की 1931 की जनगणना ने जातियों की आबादी के साथ-साथ उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को भी दर्ज किया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि उच्च जातियों के पास भूमि और संपत्ति का बड़ा हिस्सा था।
स्वतंत्रता के बाद, भारत सरकार ने भूमि सुधार और आरक्षण नीतियों के माध्यम से संसाधनों के पुनर्वितरण का प्रयास किया, लेकिन जातिगत असमानताएं बनी रहीं। उदाहरण के लिए, 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) से पता चला कि ग्रामीण भारत में 56% परिवारों के पास कोई कृषि भूमि नहीं थी, और इनमें से अधिकांश अनुसूचित जाति (SC) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के थे। इसके विपरीत, सवर्ण जातियों के पास भूमि और अन्य संपत्तियों का असमान हिस्सा था। यह दर्शाता है कि जाति और संसाधनों के बीच गहरा संबंध है, जिसे समझने के लिए व्यवस्थित आंकड़ा संग्रह आवश्यक है। विशेषज्ञ योगेंद्र यादव ने सुझाव दिया कि इसमें सवर्ण जातियों और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को भी शामिल करना चाहिए ताकि पिछड़ेपन को सटीक रूप से मापा जा सके।
जाति जनगणना के साथ संसाधन गणना की आवश्यकता क्यों?
जाति जनगणना के साथ संसाधन गणना को शामिल करने के कई कारण हैं. इससे सामाजिक-आर्थिक असमानताओं का सटीक आकलन किया जा सकता है क्योंकि केवल जाति की गणना से यह नहीं पता चलता कि विभिन्न जाति समूहों की आर्थिक स्थिति कैसी है। संसाधन गणना (आय, संपत्ति, भूमि, शिक्षा, और रोजगार) से यह स्पष्ट होगा कि कौन से समूह संसाधनों से वंचित हैं और किनके पास विशेषाधिकार हैं। उदाहरण के लिए, बिहार की 2023 की जाति गणना ने न केवल जातियों की आबादी, बल्कि उनकी आर्थिक स्थिति को भी दर्ज किया, जिससे नीति निर्माण में मदद मिली रही है।
संसाधन गणना से संसाधनों के वितरण का पता चलेगा जो जातिगत जनगणना से प्राप्त आंकड़े संसाधनों के समान वितरण को सुनिश्चित करने में मदद करेंगे। जातिगत जनगणना से विभिन्न जातियों की जनसंख्या और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति का पता चलता है, जबकि संसाधन गणना से संसाधनों के समान वितरण सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी । यह नीतियों को अधिक लक्षित और प्रभावी बनाने में सहायक होगा। यह कहा जा सकता है कि संसाधन गणना के बिना, जातिगत आंकड़े अधूरे हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी जाति की आबादी अधिक है, लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत है, तो उन्हें आरक्षण या अन्य लाभ देने की आवश्यकता नहीं हो सकती। इसके विपरीत, कम आबादी वाली लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर जातियों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। जाति जनगणना के साथ आर्थिक स्थिति का मूल्यांकन यह सुनिश्चित करेगा कि सहायता वास्तव में जरूरतमंदों तक पहुँचे। भारत का संविधान सामाजिक न्याय और समावेशिता को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। संसाधन गणना यह समझने में मदद करेगी कि विभिन्न जाति समूहों के बीच संसाधनों का वितरण कितना असमान है, और इसे सुधारने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं और कैसे सामाजिक न्याय की ओर बढ़ा जा सकता है। इससे कानूनी और संवैधानिक आवश्यकता की भी पूर्ति होगी क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में, जैसे इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992), में आरक्षण नीतियों के लिए मात्रात्मक आंकड़े की आवश्यकता पर जोर दिया है। संसाधन गणना इस कानूनी आवश्यकता को पूरा करने में सहायक होगी।

अब प्रश्न यह है कि जाति जनगणना के साथ संसाधन गणना को प्रभावी बनाने के लिए कौन से विषय सामिल किये जाएँ ? इसके लिए आय और संपत्ति, भूमि स्वामित्व, शिक्षा और रोजगार, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं तक पहुँच, ऋण और वित्तीय स्थिति सामाजिक पूंजी आदि विषयों को शामिल किया जाना चाहिए। यह प्रत्येक परिवार की वार्षिक आय, संपत्ति (जैसे, घर, वाहन, और अन्य मूल्यवान वस्तुएं), ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में भूमि स्वामित्व का विवरण एकत्र करेगा जो अनुसूचित जातियों के पास केवल 9% कृषि भूमि है, जो उनकी 18.5% ग्रामीण आबादी से काफी कम है, को स्पष्ट करने में सहायक होगा। यह आंकड़ा भूमि सुधार नीतियों के लिए महत्वपूर्ण है। परिवार के सदस्यों की शैक्षिक योग्यता और रोजगार की स्थिति (नौकरी का प्रकार, क्षेत्र, और आय) को दर्ज करना चाहिए। इससे यह पता चलेगा कि कौन से समूह शिक्षा और रोजगार में पीछे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं, स्वच्छ पानी, बिजली, और आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं तक पहुँच का आकलन करना चाहिए। यह सामाजिक विकास के लिए नीतियां बनाने में सहायक होगा। परिवारों के ऋण (बैंक, साहूकार, या अन्य स्रोतों से) और वित्तीय स्थिरता का आकलन करना चाहिए। यह इस परिस्थिति को समझने में मदद करेगा कि कौन से समूह आर्थिक दबाव में हैं। सामाजिक नेटवर्क, संस्थानों तक पहुँच, और सामुदायिक संसाधनों का उपयोग भी दर्ज करना चाहिए, क्योंकि यह जातिगत विशेषाधिकार का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
अब कोई पूछ सकता है कि जाति और संसाधन गणना के संयोजन से क्या लाभ होगा? तो यह वंचित समूहों की पहचान, विशेषाधिकारों का विश्लेषण, नीतियों का प्रभावी कार्यान्वयन और सामाजिक एकता को बढ़ावा में सहायक हो सकता है. इससे यह स्पष्ट होगा कि कौन सी जातियां संसाधनों से वंचित हैं, जिससे लक्षित कल्याणकारी योजनाएं बनाई जा सकेंगी। उदाहरण के लिए, बिहार की 2023 की गणना से पता चला कि अति पिछड़ा वर्ग (Economically Backward Class) की आर्थिक स्थिति सबसे कमजोर थी, जिसके आधार पर सरकार ने विशेष योजनाएं शुरू की है । यह समझने में मदद मिलेगी कि कौन सी जातियां संसाधनों पर अधिक नियंत्रण रखती हैं। उदाहरण के लिए, 1931 की जनगणना में सवर्ण जातियों के पास भूमि और संपत्ति का बड़ा हिस्सा था, और यह स्थिति आज भी कई क्षेत्रों में बनी हुई है। संतुलित संसाधन वितरण में यह गणना सहायक हो सकती है । संसाधन गणना से यह पता चलेगा कि मौजूदा नीतियां (जैसे, आरक्षण, भूमि सुधार) कितनी प्रभावी हैं और किन क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता है। किसी भी देश के लिए सामाजिक एकता महत्वपूरण है, यह गणना सामाजिक एकता को मजबूत कर सकती है और जातिगत भेदभाव को कम करने में मदद कर सकती है। मूल संबैधानिक मूल्य सामाजिक न्याय को मजबूत करने में सहायक हो सकती है।
चुनौतियां और समाधान
जाति और संसाधन गणना के कार्यान्वयन में कई चुनौतियां भी हैं। आंकड़ों की सटीकता, जटिलता और लागत, राजनीतिक दुरुपयोग, सामाजिक संवेदनशीलता ऐसे महत्वपूर्ण पहलू हैं जहाँ चुनौतियाँ बरक़रार हैं। लोग अपनी आय, संपत्ति, या जाति को छिपा सकते हैं। जैसे 2011 की SECC (Socio-Economic and Caste Census) में 46 लाख परिवारों ने अपनी जाति नहीं बताई। इसका समाधान आंकिक (डिजिटल) और पारदर्शी आंकड़ा संग्रह प्रणालियों, जैसे बिहार में ‘बिजगा’ ऐप, जैसे उपाय उपयोग में लाया जा सकता है। संसाधन गणना एक जटिल और महंगी प्रक्रिया है। सरकार ने 2021 की जनगणना के लिए लगभग 8,000 करोड़ रुपये का बजट अनुमानित किया था। जनगणना समय पर न होने से उसमे कटौती के भी अनुमान हैं । इसे प्रभावी बनाने के लिए प्रशिक्षित प्रगणकों और उन्नत तकनीक (जैसे, AI) का उपयोग करना होगा। संसाधन गणना के आंकड़ों का राजनीतिक लाभ के लिए दुरुपयोग हो सकता है, इसे नाकारा नहीं जा सकता । जैसे मायावती ने BJP और कांग्रेस पर इस मुद्दे का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया। इसके लिए स्वतंत्र और पारदर्शी आंकड़ा प्रबंधन प्रणाली स्थापित करनी होगी। जिससे राजनीतिक दुरुपयोग पर प्रभावी रोक लगाई जा सके। कुछ लोग संसाधन गणना को निजता का उल्लंघन मान सकते हैं। इसके लिए जन जागरूकता अभियान और गोपनीयता की गारंटी देनी होगी। लोगों में विश्वास बहाल के लिए समुचित उपाय किये जाने चाहिए।
जाति जनगणना के साथ संसाधन गणना को शामिल करना भारत में सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को समझने और समाधान करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम हो सकता है। यह न केवल यह स्पष्ट करेगा कि विभिन्न जाति समूहों के पास कितने संसाधन हैं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करेगा कि नीतियां जरूरतमंदों तक पहुंचें। हालांकि, इस प्रक्रिया में आंकड़ों की सटीकता, गोपनीयता, और राजनीतिक निष्पक्षता सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा। जाति और संसाधनों के बीच संबंध को समझकर, भारत एक अधिक समान और न्यायपूर्ण समाज की ओर बढ़ सकता है, जहाँ संसाधनों का वितरण न केवल जाति, बल्कि आवश्यकता पर आधारित हो। अब देखना यह होगा की सरकार जनगणना में संसाधन गणना को शामिल कर सामाजिक न्याय की ओर बढ़ने का सफल प्रयास करती है या नहीं? या यह एक चुनाव पूर्व जूमला ही साबित होगा?
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अच्छेलाल प्रजापति राजकीयकृत +2 उच्च विद्यालय हरिनामाड़, चैनपुर (पलामू, झारखण्ड) में एक अध्यापक हैं। उनसे alprajapatibhu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।
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