‘फुले’ फिल्म : इस नज़रिए से भी

आजकल दलित-बहुजन लोगों में ‘फुले’ मूवी को देखने की बड़ी होड़ है। सवर्णों और अंधभक्तों की तरह इनको भी लगने लगा है कि अब किताबों को छोड़कर सारा का सारा इतिहास हम भी फिल्मों से ही ले लेंगे। कश्मीर फाइल्स, केरल फाइल्स और छावा जैसी फिल्में बनती हैं तब वे फिल्में प्रोपेगेंडा लगती हैं और, दूसरी ओर, जब फुले जैसी मूवी बनती है तो इतिहास! एक बात याद रखिए मौजूदा माहौल में ऐसी कोई भी फिल्म अम्बेडकर-फुले-पेरियार पर नहीं बन सकती जो उनके हूबहू तेवर के साथ दिखा सके। जो सवर्ण समाज इन लोगों का तेवर और विचार बर्दाश्त नहीं कर सकता आप उनसे उम्मीद रखते हैं कि वो अम्बेडकर-फुले-पेरियार को जस का तस पेश करेंगे? कभी नहीं! अगर कोई निर्माता-निर्देशक इन महानायकों के साथ फिल्म के ज़रिये न्याय करना भी चाहते तो सेंसर बोर्ड है. वह तब तक उसमें ‘कट’ लगता रहेगा जब तक वह वर्चस्वादी व्यवस्था के लिए हानिरहित न हो जाए. अपने महानायकों को कला के माध्यम से याद करना ठीक है लेकिन फिलहाल इन फिल्मों को इतिहास के नज़रिए से देखना कतई ठीक नहीं है.

कोई भी ब्राह्मण या सवर्ण आपके महापुरुषों को अपने मन-मुताबिक पेश करेगा. वह वही दिखाएगा जो वह दिखाना चाहता है। वो आपके महापुरुषों से ऐसी चीजें जोड़ देगा जो उनके विचारों के बिल्कुल विपरीत हों और हो सकता है कि अधिकांश लोगों को पता भी न चले.

फुले फिल्म को लेकर ये विवाद तब और बढ़ गया जब विपक्षी पार्टियां और खास कर कांग्रेस ने इसका उपयोग अपनी राजनीति के लिए किया। आप में से अधिकतर लोग जानते होंगे कि 1982 में एक फिल्म बनी थी ‘गाँधी’. यह फिल्म कांग्रेस की सरकार में बनी और इस फिल्म में बाबा साहेब आंबेडकर की एक झलक तक आपको देखने के लिए नहीं मिलती. तो सोचिए कांग्रेस अम्बेडकर पर पर्दा डालने के लिए किस हद तक गई. हालाँकि फिल्म में गांधी-जिन्ना संबंध बखूबी दिखा दिए गए. और तो और गांधी को अछूतों का महानायक तक बना दिया गया और आपको आश्चर्य होगा इस फिल्म को बनाने में कांग्रेस ने भारत सरकार का ही धन खर्च किया। मैं भी बाबा साहेब आंबेडकर की तरह मानता हूं कि गांधी महान नहीं थे बल्कि कांग्रेस ने जबरदस्ती उनको महान बनाने के लिए एड़ी-चोटी तक का ज़ोर लगा दिया। और आज वही कांग्रेस गांधी को छोड़कर उस आंबेडकर के नाम पर वोट मांगने को मजबूर है जिसे हमेशा से ही उसने राजनीति से वंचित और अछूता रखा है।

फुले को पढ़ने और घर-गाँव-कूचे तक पहुँचाने की ज़िम्मेदारी तमाम वंचित समाजों की थी. चाहे वो दलित समाज हो या महिला समाज। मगर आज ये इतने में ही खुश है कि फुले फिल्म बनी है और अब हम इसको देख कर क्रांति कर देंगे। इस फिल्म का उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना है और कुछ नहीं। युवा लोगों से अपील है किताबें पढ़िए और पढ़ाइए, इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है महापुरुषों को जानने और समझने का। वरना क्या फर्क रह जाएगा आप में और उन में जो फिल्मों में इतिहास खोजते हैं।

मगर दलित समाज इतना भोला है कि जहाँ किसी फिल्म में उसका जिक्र हुआ वह पूरा संवेदना से भर उठता है। इस बात से अंजान कि फिल्म बनाने वाला व्यक्ति किस प्रोपेगेंडा या उद्देश्य पूर्ति के लिए फिल्म बना रहा है। इसी तरह का जुनून दलितों में ‘आर्टिकल 15’ फिल्म के लिए मिला था। फिल्म एक दलित लड़की के साथ गैंगरेप और हत्या पर आधारित थी। फिल्म में दलित किरदारों को बेबस, असहाय और मजबूर सांचे में ढालकर दिखाया गया था जैसा कि बॉलीवुड अक्सर करता आया है। वे या तो इनायत की भीख माँगते नज़र आते हैं या उच्च-जाति से आए नायक का आभार जताते हुए।

इस फिल्म में भी नायक को गोरी चमड़ी और ब्राह्मण जाति का दिखाया गया और इसके विपरीत दलित लोगों पर काला रंग चढ़ा कर उन्हें बेबसी से भर दिया गया। हर बार की तरह इस बार भी दलितों का उद्धारक और नायक एक ब्राह्मण को बना दिया गया। ब्राह्मण भी वो जो UPSC की परीक्षा पास करके अफ़सर तो बन जाता है मगर भारत में व्याप्त जातिक्रम और जातिवाद से अंजान है। बड़े ही आश्चर्य की बात है और बेवकूफी से भरी हुई भी। क्या यह उस प्रोपेगेंडा की पूर्ति नहीं करता है जो स्वर्ण जातियाँ अपने फायदे के लिए करती हैं? क्यों दलितों का उद्धारक, रक्षक और नायक एक तेज-तर्रार, आत्मविश्वास से भरा हुआ और सवर्णों से अलग सोच रखने वाला दलित नहीं हो सकता? अगर दलित नायक की इस तरह की तस्वीर पर्दे पर पेश की गई तो फिल्म बनाने वालों के सवर्ण भाई बंधुओं और जातिवादी लोगों के पेट में खलबली मच जाएगी।

क्यों दलितों का नेतृत्व कोई दलित अभिनेता करता नज़र नहीं आता है? फिल्म में सभी सम्मानजनक किरदार सवर्ण जातियों से आए अभिनेताओं के हिस्से डाल दिए गए मगर काले, गंदे पानी से भरे सेप्टिक टैंक से बाहर निकल रहे दलित कर्मचारी के किरदार को निभाने वाला अभागा व्यक्ति उसी दलित जाति से ले लिया गया। फिल्म खत्म होती है, मंद मंद आवाज़ में संगीत की धुन पर और हम आंखों में आंसू और गहरी संवेदना लेकर खड़े होकर तालियां बजाते हैं। उन सब चालाकियों से अंजान जो हमारे ही समाज, विचार और आंदोलनों के लिए खतरा है।

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मनीष कुमार दिल्ली विश्विद्यालय से एम्.ए. पोलिटिकल साइंस के विद्यार्थी हैं.

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