उत्तर प्रदेश में ‘मौन क्रांति’ का क्या हुआ?

निर्बन रे और ओम प्रकाश महतो (Nirban Ray & Om Prakash Mahato) मुख्य रूप से दो दृष्टिकोण ही चलन में रहे हैं जिनके द्वारा सामान्य रूप से उत्तर भारत और विशेष रूप से उत्तर प्रदेश की राजनीति का विश्लेषण किया जाता है। ये दो दृष्टिकोण या विश्लेषण, हालांकि विभिन्न पद्धतियों या विविध केस-स्टडीज़ (मामले के […]

संगठनात्मक-नेतृत्व के सिवा कोई करिश्मा दलित-राजनीति के किसी काम का नहीं

राहुल सोंनपिंपले (Rahul Sonpimple) करिश्मा मायावी दुनिया का शब्द है लेकिन नेतृत्व को परिभाषित करने के लिए यह शब्द आम इस्तेमाल होता है. करिश्माई नेतृत्व को आमतौर पर आवश्यक और सहमति के रूप में लिया जाता है, खासकर राजनीति में. हालांकि, करिश्माई नेतृत्व का इतिहास इस तरह के रोमांसवाद को जारी रखने की अनुमति नहीं […]

उत्तर प्रदेश में लोकतान्त्रीकरण की प्रक्रिया में बहुजन समाज पार्टी का योगदान

जातीय वर्चस्व और लोकतंत्र विनोद कुमार (Vinod Kumar) उत्तर प्रदेश सामाजिक रूप से एक ऐसा राज्य है जहाँ सामंतवाद, और सवर्ण वर्चस्व का बोलबाला है. एक तरफ जहाँ राज्य के संसाधनों (जमीन, व्यवसाय, उद्योग) पर इन्ही सामंती जातियों का कब्ज़ा है तो दूसरी तरफ एक बहुसंख्यक बहुजन समाज मात्र श्रमिक बने रहकर ही सदियों से […]