ratnesh katulkar

डॉ रत्नेश कातुलकर (Dr. Ratnesh Katulkar)

दुनिया के मज़दूर एक हो! कार्ल मार्क्स का यह कितना अच्छा संदेश है. यदि वास्तव में ऐसा हो पाता तब किसी एक देश-विशेष तो क्या दुनिया के किसी भी कोने में कोई भी व्यक्ति मानव अधिकार से वंचित नहीं रह पाता.

लेकिन मज़दूरया वंचित भला एक कैसे हो सकते हैं! इनके बीच जाति, उपजाति, धर्म, सम्प्रदाय, क्षेत्र, प्रांत, लिंग और न जाने कितने ऐसे कारक हैं जो इन्हें एकजुट होने से रोके हुये हैं. और आपस में टकराव ऊंच-नीच के संघर्ष और हिंसा का आधार बने हैं. वंचित तबका चूंकि वंचित है इसलिये अकसर वह जानकारी और ज्ञान के मामले मे भी वंचित रहा है. उसे यह किंचित भी आभास नहीं है कि वह अपनी जिस संस्कृति की दुहाई देते हुये जहाँ अपने समुदाय की मान्यताओं को मनवाने के लिये दूसरे वंचितों से लड़-भिड़ पड़ता है उसका मास्टर-माइंड कौन है?

इंसान और इंसान में भेद कराने वाली इन तमाम संस्थाओं का निर्माण अपने आप नहीं हुआ बल्कि यह एक चालाक शासक वर्ग के दिमाग की उपज है. हालांकि कुछेक बार भले ही यह भेद प्राकृतिक या भौगोलिक कारणों से हो गया हो लेकिन ऐसे में भी एक समुदाय का दूसरे समुदाय से वैमनस्य केवल एक शातिर दिमाग की ही उपज है. दरअसल हम जिसे हमारी मान्यता, अपनी संस्कृति और हमारी अपनी विचारधारा मानने की भूल कर देते हैं वह अकसर किसी शातिर शासक तबके के दिमाग की उपज होती है.

अब एक छोटे से उदाहरण को लीजिये. जैसे ‘सुंदरता’. अब आप कहेंगे इसमें कहाँ राजनीति! यह तो स्वाभाविक और प्रकृति प्रदत्त है. किंतु अगर आप सुंदरता को वाकई निरपेक्ष अवधारणा यानी किसी और के दिमाग की उपज नहीं बल्कि केवल और केवल अपने मन की अनुभूति मानते हैं तो आप निश्चित रूप से गलत है. किसी स्त्री या पुरूष के सुंदर होने का पैमाना जो हम लोगों ने अपने मन में बैठा कर रखा है दरअसल वह भी हमारी अपनी अनुभूति नहीं बल्कि शासक तबके के द्वारा निर्धारित मापदण्ड भर है. जो व्यक्ति उनके इस मापदण्ड पर खरा उतरता है वह हम सबके लिये सुंदर होता है और जो इस मापदण्ड को पूरा नहीं कर पाये वह बदसूरत!

आप में कुछ लोगों को यह बात अटपटी लग सकती है और आप इससे असहमत भी हो सकते हैं. लेकिन ज़रा आप फिल्मी हीरो-हीरोइनों और मॉडलों जैसे केटरीना केफ, सलमान खान, रितिक रोशन, करीना कपूर आदि पर नज़र डालिये. आपको ये सभी गोरे-चिट्टे और कथित आर्य कही जाने वाली नोर्डिक नस्ल (Nordic Race) के ही दिखेंगे. आप कहेंगे इसमे क्या आपत्तिजनक है चूँकि ये लोग वाकई सुंदर हैं, इसलिये ही तो ये हीरो और हीरोइन हैं.

अगर आप भी ऐसा ही सोचते हैं तो आपको थोड़ा ठहर कर सोचना होगा कि आखिर आपकी यह सोच कैसे बनी? क्या यह आपकी अपनी निजी और स्वाभाविक सोच है या आप किसी राजनीति का शिकार तो नहीं हुये? हैरान मत होईये, सच तो यह है कि आपके मन में गढ़ी हुई सुंदरता की परिभाषा आपकी अपनी नहीं है बल्कि यह शासक तबके के द्वारा आपके मन के भीतर बसा दी गई है.

आज आप जिन हीरो और हीरोईनो को सुंदर मानते हैं उसकी जड़ में आपके माता-पिता के ज़माने में पेश किये जाते रहे हीरो-हीरोइनों का अक्स है. सफेद-चमड़ी को सुंदर और काली-चमड़ी को बदसूरत मनवाने की ज़िद का दरअसल कुछ और नहीं बल्कि वह द्रविड नस्ल पर ब्राह्मणों की जीत का एक राजनीतिक परिणाम है.

हमें नहीं भूलना चाहिये कि मध्यप्रदेश के गोंड राजाओं द्वारा निर्मित खजुराहो की मूर्तियां आर्य सौंदर्य के मापदंड के विपरीत अनार्य या मूलनिवासी नैन-नक्श लिये हैं. लेकिन आकृतियों में प्रतिबिंबित दृश्य गोंड दर्शन नहीं बल्कि ब्राह्मणी दर्शन कामसूत्र है. यानी यहाँ भी राजाओ के आदिवासी होने के बावजूद भी वे ब्राहमणवाद की गिरफ्त में रहे. उनकी इस नादानी से उन्होंने अनजाने में अपनी आने वाली पीढ़ी और पूरे वंचित समुदाय को भी ब्राहमणवाद की गिरफ्त में डाल दिया.

इस तथ्य से मुट्ठी भर ब्राह्मणों की साज़िश साफ उजागर होती है कि कैसे उन्होंने एक आदिवासी शासक को दिमागी रूप से ग़ुलाम बना कर गोंड दर्शन जो मानववादी विचारधारा पर आधारित था, को मिटाने के लिये इस्तेमाल किया. हालांकि यह पहली साजिश नहीं थी. प्रख्यात विचारक मुद्राराक्षस अपनी किताब ‘धर्म ग्रंथों का पुनर्पाठ’ में लिखते हैं कि प्राचीन भारत में राजा भले ही क्षत्रिय या शूद्र वर्ण के क्यो न हो, वे अपने चारों तरफ ब्राह्मणों से ही घिरे होते थे. उनका सलाहकार और पुरोहित जहाँ ब्राह्मण होता था तो उनके बेटे का परम मित्र भी इसी ब्राह्मण-पुरोहित का बेटा होता था. इस तरह राजा और राजकुमार हरदम ब्राह्मणों की सलाह और निर्देश पर ही चलते थे और अनजाने में बड़ी सरलता से खुद ब्राहमणवादी हो जाते थे.

खजुराहो इस बात का एक ठोस प्रमाण है. लेकिन यहाँ गौर करने की बात है कि इसमें ब्राह्मण भले ही सुंदरता का अपना ब्राह्मणी मापदंड गोंड राजा पर नहीं थोप पाये लेकिन अपना दर्शन थोपने में जरूर कामयाब हुये.

सोचने की बात है कि आखिर वह क्या था जिसने ब्राह्मणों को खजुराहो में अपने ब्राह्मणी सौंदर्य के मापदंड को थोपने से रोका, तो इसका सीधा जवाब है कि इस काल में ब्राह्मण सीधे सत्ता में नहीं थे बल्कि वह पीछे से सत्ता नियंत्रित कर रहे थे. ऐसे में भला वे गोंड नैन-नक्श को बदसूरत कैसे करार दे सकते थे! लेकिन गौर करने की बात हैं कि जिस क्षण वे आदिवासियों से सत्ता हथिया कर खुद राजा बनने में कामयाब हुये उन्होने तुरंत अपने ब्राह्मणी सुंदरता के मापदंड देश पर ऐसे थोपे की हम आज तक उसकी गिरफ्त से नहीं निकल पाये हैं.

क्या यह बात वंचित तबके के लिये चिंता का विषय नहीं होना चाहिये?

अब आज के ज़माने की बात की जाए. जब एक जनजाति समुदाय की बॉक्सर मेरी कॉम, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस हद तक मुकाम बनाने में सफल होती है कि बॉलीवुड को मजबूर होकर उस पर फिल्म बनानी पड़ी. तब पर्दे पर उनकी भूमिका के लिये हमारी फिल्म इंडस्ट्री को कोई पूर्वोत्तर भारत की जनजाति की लड़की उपयुक्त नहीं लगी. बल्कि इसके लिये भी उन्होने अपने ब्राह्मणी मापद्ण्ड के अनुसार आर्य या नोर्डिक नस्ल (Nordic Race) की प्रियंका चोपड़ा को चुना. जबकी वह किसी भी लिहाज़ से मेरी कॉम के समरूप नहीं है.

ठीक इसी तरह जब अर्धद्रविड नस्ल की नेत्री जयललिता पर बायोपिक बनाई गई तो यहाँ भी उन्होंने दक्षिण भारत की द्रविड़ या अर्ध द्रविड़ नस्ल को इस रोल के लिये उपयुक्त नहीं पाया. बल्कि अपने सौंदर्य के ब्राह्मणी मापदण्ड के अनुसार मध्यएशियाई मूल की राजपूत जाति की अभिनेत्री कंगना रनौत को लिया. जो किसी भी लिहाज़ से जयललिता से मिलती-जुलती नहीं है.

हिंदी फिल्म की इन्हीं हरकतों की वजह से हमारी पीढ़ियों में सुंदरता को लेकर ब्राह्मणी सोच अपनी पैठ बना पाई है. 

हालांकि अभी हाल ही में तमिल फिल्मों के युवा दलित निर्देशक पा रंजीत और मराठी फिल्मों के नागराज मंजुळे, हमें उम्मीद की किरण के रूप में नज़र आते हैं, जो ब्राह्मणी सौंदर्यशास्त्र को मजबूती से चुनौती देते हुए दलित सौन्दर्य के मानदंड गढ़ रहे हैं.

इधर कुछ दिनों से हाशिए के समुदायों में बात चली है कि अब हम अपनी बात खुद लिखेंगे. अपना साहित्य खुद रचेंगे. सत्तर के दशक में दलित पैंथर इस मामले में मील का पत्थर साबित हुआ था. लेकिन आज के हमारे युवा जब यह बात करते हैं तो वह इस बात से बिल्कुल अनजान रहते हैं कि वे खुद को अपने समुदाय का प्रतिनिधि मानकर जिस विमर्श में अपनी भागीदारी जता रहे हैं अकसर वह विमर्श भी सत्ताधारी तबके के द्वारा तय और निर्देशित होते हैं. जिसे अनजाने ही हमारे लोग अपने नये-नये प्रयासों के माध्यम से आगे बढ़ाकर अपने जैसे ही दूसरे वंचित तबके से उलझ कर शोषक तबके की राजनीति का शिकार हो रहे हैं.

इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि हाल ही में कुछ लोगो ने ऐसी ही राजनीति का शिकार होकर दलित और आदिवासी को आपस में भिड़ाने की चेष्टा की है. उनका यह कहना है कि संविधान में डॉ बाबासाहेब आंबेडकर ने आदिवासी शब्द की उपेक्षा कर उन पर अनुसूचित जनजाति शब्द थोप दिया और इसके माध्यम से उन्होंने आदिवासियों को उनके मूलनिवासी कहलाने के हक़ से उन्हें महरूम कर दिया.

लेकिन हमें यहां सत्ताधारी तबके के द्वारा फैलाए इस झूठ को सच नहीं मानना चाहिए बल्कि स्पष्ट रूप से समझना चाहिए कि आदिवासी शब्द भले की कुछ जनजाति समुदायों में प्रचलित है, लेकिन यह शब्द पूर्वोत्तर की जनजातियों को कतई स्वीकार नहीं है. क्योंकि वे आदिवासी शब्द को अपमानजनक मानते हैं.

दूसरा जैसा कि खुद डॉ आम्बेडकर ने संविधान सभा की बहस में खुद कहा था कि ‘आदिवासी’ शब्द उस काल में दलितों के लिये प्रयुक्त ‘अछूत’ शब्द की तरह है जिसकी कोई कानूनी परिभाषा नहीं हैं. जिस तरह एक हिंदू के लिए न सिर्फ एक दलित बल्कि कभी कभी कोई शूद्र यानी ओबीसी, मुसलमान और ईसाई तो क्या स्वयं रजस्वला ब्राह्मणी भी अछूत हो सकती है. ठीक इसी तरह आदिवासी भी एक ऐसा शब्द है जिस पर कोई भी समुदाय दावा कर सकता है. इसलिये उन्होंने जनजाति समुदाय की संवैधानिक सुरक्षा निश्चित करने के लिए उनके लिए अनुसूचित जनजाति शब्द अधिक उपयुक्त पाया। उस काल में आदिवासियों के एक बड़े नेता जयपाल सिंह समेत सभी जनजाति प्रतिनिधि संविधान सभा में बाबासाहेब के इस तर्क से सहमत हुए थे. लेकिन आज के आदिवासी नेता इस मुद्दे को तूल देकर बिना कारण   डॉ आम्बेडकर को गलियाने लगे हैं. प्रश्न है कि जब इस शब्द पर उस काल के किसी जनजाति नेता ने आपत्ति नहीं की तो फिर आज के नेतओं को इसमें क्या समस्या दिखने लगी है!

इस मामले को तूल देने वाले इस बात को क्यों नज़र-अंदाज करते हैं कि कानूनी रूप से स्वीकृत अनुसुचित जनजाति शब्द के माध्यम से कितने ही आदिवासी अच्छी नौकरी और शिक्षा में सफल हो पाये हैं वहीँ ऐसे कितने ही आदिवासी एक्टिविस्ट हैं जो अपनी आदिवासी या ट्राइबल की पह्चान के साथ यूएनओ जैसे अंतरराष्ट्रिय मंचों पर भी जनजातियों की आवाज़ पहुँचाने में सफल हुये हैं. इस तथ्य से हमें आदिवासी बनाम अनुसूचित जनजाति की लड़ाई का खोखलापन साफ नज़र आता है. फिर जैसा कि हम पहले भी उल्लेख कर चुके हैं, हमें समझना होगा कि आदिवासी शब्द पूर्वोत्तर की जनजातियों को कतई स्वीकार नहीं है.

दरअसल जिस तरह संविधान में दलित शब्द को मान्यता न देकर उसके लिये अनुसूचित जाति शब्द को मान्यता मिली है, ठीक उसी तरह आदिवासी मामले में भी हुआ. जहाँ सत्तर के दशक में दलितों ने अपने आंदोलनों के लिये बिना दलित और अनुसूचित जाति शब्द को आपस में भिड़ाए, अपने दलित पैंथर के माध्यम से सत्ताधारियो की नींदे हराम कर दीं थी. ठीक इसी तरह आज के प्रबुद्ध आदिवासी युवा अपने आंदोलन और लेखनी में आदिवासी शब्द का इस्तेमाल कर सकते हैं और अपने कानूनी अधिकार के मामले में अनुसूचित जनजाति शब्द का.

उम्मीद है हाशिये के समुदाय सत्ताधारी मानकों और निर्देशों से मुक्त होकर दुनिया के मज़दूर एक हो की राह पर अपने कदम बढ़ा पाएंगे.

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डॉ रत्नेश कातुलकर भारतीय सामाजिक संस्था, नई दिल्ली में सोशल साइंटिस्ट है। हाल ही में उनकी एक किताब बाबासाहेब डॉ आम्बेडकर और आदिवासी प्रश्न? चर्चित रही, जिसके माध्यम से इन्होने आदिवासी और दलित समुदाय के बीच खाई बनाने वालो की साज़िश की अच्छी खबर ली है. 

 

2 thoughts on “सत्ताधारियों का विमर्श ढोते हाशिये के लोग”

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