विकास कुमार (Vikash Kumar)

(हाथरस प्रकरण को याद करते हुए)

मैं एक दलित थी
इसलिए वर्दी वाले ‘रक्षकों’ ने
एक अँधेरी रात में
मुझे जलाकर गुनाहगारों इन्साफ परोस कर दिया
अगर दलित न होती तो मैं जिंदा होती
मेरे भी सपनों की परवाज़ आकाश छूती

लेकिन मैं एक दलित थी
इसलिए पूरा बरस बीत गया
इन्साफ को मेरी राख का भी पता नहीं मिला
बरस बीतते जायेंगे
लेकिन अदालतों के होंठ सिले रहेंगे
जिनके होंठों पर गिले रहेंगे
उन्हें कैसे चुप कराना है
ब्राह्मणवादी सिस्टम जानता है

मैं एक दलित थी
इसलिए इस रामराज्य में
शम्भूकों, एकलव्यों की यही होनी है
मिर्चपुर, खैरलांजी, गोहाना
अदालतों के मुहाने पर बिलखते रहेंगे
रामराज्य की कुर्सी पर पुरुष बैठे या औरत
तंत्र अपना काम करता है
इन्साफ की कलम में
ब्राह्मणवाद स्याही भरता है

मैं एक दलित थी
इतनी शिनाख्त काफी है
कि संविधान की अनदेखी कर
गुनाहगारों को बा-इज्ज़त बरी किया जाये
कानून की किताबों में छेद किये जाएँ

लेकिन
मेरी राख कभी ठंडी नहीं होगी
बारिशों में भी दहकेगी
हवाओं पर सवार होकर
अंगारों सा भड़केगी
इन्साफ का होना लाज़मी बात है
कसमसाई हुई चीख से लेकर
तनी हुई मुट्ठियों तक
राख सफ़र तय करती है
नाइंसाफ सलतनत को नेस्तनाबूत करने तक
जज्बा सफ़र करता है

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विकास कुमार सेंटर फ़ॉर हिस्टोरिकल स्टडीज, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली, में पीएचडी शोधार्थी हैं.

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