(1) गैर विद्रोही कविता की तलाश

मुझे गैर विद्रोही
कविता की तलाश है
ताकि मुझे कोई दोस्त
मिल सके।
मैं अपनी सोच के नाखून
काटना चाहता हूँ
ताकि मुझे कोई
दोस्त मिल सके।
मैं और वह
सदा के लिए घुलमिल जायें।
पर कोई विषय
गैर विद्रोही नहीं मिलता
ताकि मुझे कोई दोस्त मिल सके।

(2)

ये रास्ते
धरती और मंगल के नहीं
जिन्हें राकेट नाप सकते हैं
ना ये रास्ते
दिल्ली और मास्को या वाशिंगटन के हैं
जिनको आप रोज़ नापते हैं
यह दूरी जो हमारे और तुम्हारे बीच है
तीरों के नापने की है!


(3) संस्कृति

तुम क्या हो ?
क्यूँ चेहरा छुपाया है ?
पर्दों में चलती है क्यूँ ?
क्यूँ नाखून भी छिपाए हैं ?
आखिर तुम हो कौन ?

उस इंसान को कहीं देखो
जो रात दिन भारी रथ खींचता है
उसके कानों में राम के समय का ढला सिक्का है
उसके जिस्म पर उन बैंतों की लाशें हैं
जिसे काम में लाते रहे रजवाड़े, कहीं के भी
वह ज़रूर पहचानता होगा
वह रातों में कभी कभी
अम्बर जितनी आह भरता है
तारे मुरझा से जाते हैं
वह कहता है
“धरती मेरी पहली मोहब्बत है!”
वह ज़िक्र करता है
“ये तारे आसमान में मैंने जड़े हैं!”
वह ईसा के वतनों में घूमा है
वह गौतम के मुल्कों में फिरा है
उस के कानों में राम के समय का सिक्का ढला है।

(4)

कुत्ते भोंकते हैं : मेरा घर, मेरा घर
जागीरदार : मेरा गाँव, मेरी सल्तनत
लीडर : मेरा देश, मेरा देश
लोग कहते हैं : मेरी किस्मत, मेरी किस्मत

मैं क्या कहूँ?

(5)

जब आदमी मर जाता है
वह कुछ नहीं सोचता
वह कुछ नहीं बोलता

कुछ ना सोचने पर
कुछ ना बोलने पर
आदमी मर जाता है

(6) अलविदा

ऐ डूबते सूरज
कल को ज़रूर आना
मैं झुकूँगा
लेकिन तेरे होंठों को पानी लगाने जैसा पाखंड
मैं नहीं रचने वाला, मैं हथियार उठाऊँगा
मत आना- लोग हथियार उठाएंगे
तुम चाँद को भी छुपा लेना
मैं हथियार उठाऊँगा
क्या तुम नहीं जानते
मानवता खुद उस सूरज की अगन है
जिसके गीत का
दीपक है तेरा प्रकाश…
नमस्कार!
अलविदा… ऐ डूबते सूरज!

(7) बच्चियाँ

महफ़िल सजी हुई है
बच्चे खेल रहे हैं
एक के हाथ में चाँद है
एक के सूरज
पूनम और सुमीता
यह एक युग की कविताएं हैं!

(8) जाति

मुझे प्यार करती
पर-जात लड़की
हमारे सगे, मुर्दे भी
एक जगह नहीं जलाते!

(9) शब्द

शब्द तो कहे जा चुके हैं
हमसे भी बहुत पहले
और हमसे भी बहुत पहले के
हमारी हर ज़ुबान
यदि हो सके तो काट लेना
लेकिन शब्द तो कहे जा चुके हैं!

(10)

मैंने फिर तरतीब में रखे हैं
टुकड़े ज़िंदगी के
हवा ने फिर मुझे
देखा है मुस्कुरा के

(11) सोच

वे ख़याल बहुत रूखे थे
मैंने तेरे भीगे बालों को
जब मुक्ति समझ लिया


(12) प्रतिकांति के पैर

सपना ही रह गया
कि फंदा पहनायेंगे
बुरे शरीफज़ादों को
वे लकीरें निकालेंगे नाक के साथ
हिसाब देंगे लोगों के आगे।

प्रतिक्रांति के पैर
हमारी छातियों पर आ टिके
ज़लील होना ही हमारा
जैसे एकमात्र
पड़ाव रह गया।

(13) मातृभूमि

प्यार का भी कोई कारण होता है?
महक की कोई जड़ होती है?
सच का हो न हो मकसद कोई
झूठ कभी बेमकसद नहीं होता!

तुम्हारे नीले पहाड़ों के लिए नहीं
न नीले पानियों के लिए
यदि ये बूढ़ी माँ के बालों की तरह
सफेद-रंग भी होते
तब भी मैं तुझे प्यार करता
न होते तब भी
मैं तुझे प्यार करता
ये दौलतों के खजाने मेरे लिए तो नहीं
चाहे नहीं
प्यार का कोई कारण नहीं होता
झूठ कभी बेमकसद नहीं होता

खजानों के साँप
तेरे गीत गाते हैं
सोने की चिड़िया कहते हैं।

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लाल सिंह दिल (11 अप्रैल 1943 – 14 अगस्त 2007) का नाम पंजाब के बड़े और क्रांतिकारी कवियों में शुमार होता है. वे मूलतः पंजाबी कवि थे और एक दलित परिवार से आते थे. उन्होंने पंजाबी भाषा में तीन काव्य संग्रह रचे व् एक आत्मकथा (‘दास्तान’ नाम से) लिखी. 

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