करुणा (Karuna)

1
इतिहास हमारा छीन कर
कब तक मौज मनाओगे
वीर गाथा दबा कर हमारी
शेर तो ना बन जाओगे
धूर्त ही कहलाओगे

मेरे हाथ में कलम है जो
अब उसने चलना सीख लिया है
इतिहास की परतें खोल रही हूँ
मैंने खोजी होना सीख लिया है
काफी कुछ तो ढूँढ लिया है
बहुत कुछ मगर अभी है बाकि
झूठी शानो-शौकत से तेरी
पर्दा उठाना सीख लिया है
ढूँढते ढूँढते पहुँच जाऊँगी
इतिहास के आखरी पन्ने तक- इक रोज़
उस दिन इस मुल्क में
असली तख्ता पलट होगा
जल जंगल ज़मीन का सिंह गरजेगा
गीदड़ो को फिर भागना होगा
उस दिन की खातिर तुम
तैयार रहना
रहने-ठिकाने का बंदोबस्त
ज़रा करके रखना !!


2
पितृसत्ता
जहाँ सिंघासन जमा ले
वहाँ खुशियां कांपती हैं
ज़ेहनी दहशत से समाप्त हो जाता है
औरतों का जीवन
कोई इसे इज्ज़त-मर्यादा जैसे
शालीन-से शब्दों के वस्त्र पहना सकता है- मगर
डर और सहम का चेहरा नंगा रहता है
पितृसत्ता
जहाँ सिंघासन जमा ले
उन घरों में ‘राजा’ के घर आने पर
‘प्रजा’ के चेहरे पर
चुप का मातम छा जाता है !!


3
तुमने जब भी पूछी मुझसे
मेरी जाति
स्कूल में या कॉलेज में
जाने-अनजाने ही सही
मुझे तुम्हारी समझ आ गई थी
अब तुम खुद को
कितना भी
आधुनिक
प्रगतिशील
साबित कर लो
लेकिन अब
हमारे बीच
असहजता की इक दीवार है
इस ओर मेरा संघर्ष है
उस ओर तुम हो
अपने जातिवाद के साथ !

~~~

 

करुणा बी.एस.सी. मेडिकल की छात्रा हैं व् लुधियाना शहर की निवासी है. बहुजन दृष्टिकोण से कविताएँ  लिखती हैं.

4 thoughts on “मेरे हाथ में कलम है…”

  1. अल्फाज़ कम पर जाते है तारीफ करने के लिए! बेहद खूबसूरत! Thank you for sharing this round table India 🙌🙌

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