क्रांति खोड़े (Kranti Khode)

भारतीय सामाजिक व्यवस्था जो कि चार्तुवर्ण पर आधारित है. यह मनुवादी चातुर्वण व्यवस्था कहती है कि ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैष्य, शुद्र जो जिस जाति में पैदा हुआ वह उस जाति का जाति आधारित काम करेगा. उनका काम ऊपर के तीनों समाजों की सेवा करना है. यह व्यवस्था आज भी मजबूती से अपने पैर जमाए हुए है. शुद्र आज के पिछड़े वर्ग हैं जबकि अनुसुचित जातियाँ अतिशूद्र की श्रेणी में आती हैं. इन्हें प्रत्येक वर्ण से बाहर रखा गया है. यह अति-शुद्र हैं जिन्हें अस्पर्श्य कहा गया है यानि जिन्हें छू भी नहीं सकते हैं. इस वर्ण में आने वाली जातियाँ अनुसुचित जातियों के नाम से जानी जाती है. जैसे कि चर्मकार, भंगी, बलाई, बेडिया, बाछड़ा आदि. इन सभी जातियों के अपने अपने जाति आधारित काम तय है. चर्मकार का काम चमड़ा निकालना, भंगी का काम मैला ढोना, बलाई का काम बेगारी करना. इसी तरह एक जाति है जिनका काम देह व्यापार करना या आम तौर पर जिसे ‘धंधे’ के नाम से जाना जाता है. यह काम बाछड़ा जाति के हिस्से किया गया है.

यह जाति मध्य प्रदेश के रतलाम, मंदसौर, नीमच जिले में ज्यादातर हाई-वे पर निवास करती हैं और साथ ही इस समुदाय का गाँव से अलग निवास होता है जिसे डेरा कहते हैं. इन्हें बाछड़ियों का डेरा भी कहते हैं, जहाँ यह समुदाय अपना जीवन यापन करता है. बाछडा जाति एक ऐसी जाति है जिसकी पहचान इस समुदाय की महिलाओं के नाम से है. इस समुदाय के इतिहास के बारे में ये कहा जाता है कि ये राजा-महाराजाओं के जमाने में करतब दिखाने और उनका मनोरंजन करने का काम करते थे. ये समुदाय कहीं एक स्थान पर स्थाई निवास नहीं करते थे बल्कि घूमते रहते थे. इस जाति के लोग अक्सर राजा-महाराजाओं के यहाँ गुप्तचर का काम भी करते थे. दुसरे राजाओं के यहाँ बाछडा जाति की महिलाएं नाचने-गाने, करतब दिखाने आदि के लिए जाती थीं और इससे ज्यादा कुछ इनके इतिहास के बारे में कहीं जानने को नहीं मिला.

इस जाति के काम के बारे में यह बताया गया कि जिस प्रकार से आमतौर पर अन्य समुदायों में लड़की 12 से 13 साल की होती है उसे घर का काम जैसे चुल्हा-चौका का काम सिखाया जाता है उसी तरह बांछडा जाति में लड़कियों को देह-व्यापार सिखाया जाता है. जाति के बारे में और भी कई बातें सामने आईं जैसे बाछड़ा जाति में लड़कियों के जन्म पर उसके जन्म की खुशियाँ मनाई जाति हैं. और उन्हें सोने की धातु की संज्ञा दी जाती है क्योंकि सोने की धातु की कीमत बहुत होती है. यहाँ जन्म के समय ही यह तय हो जाता है कि कौन सी लड़की धंधे में जाएगी. या तो सबसे बड़ी लड़की को या सबसे छोटी लड़की को धंधे में उतारा जाता है. और जो लड़की धंधे में नहीं जाती उसकी शादी कर दी जाती है.

जिस लड़की को धंधे में उतारने के लिए रखते है, जैसे जैसे वह लड़की बड़ी होती है. उसके परिवार की अपेक्षाएं भी बढ़ने लगती हैं. जब वो लड़की 11 से 12 साल की उम्र की हो जाती है उसकी पढाई बंद और उसकी धंधे की ट्रेनिंग शुरू हो जाती है. ट्रेनिंग यानि धंधा कैसे किया जाता है. यह काम वह करती हैं जो जो पहले से इस धंधे में हैं. यूं यह मासूम लड़कियाँ सीखती हैं कि देह के ग्राहकों से कैसे बात की जाती है. खुद को कैसे सजाना-संवारना है. कपड़े कैसे पहनना है, और यह कि पूरा सिस्टम कैसे काम करता है वह सीखती हैं. जब वह लड़की 13 से 14 साल की हो जाती है तब उसे धंधे में उतार देते हैं. धंधे में उतारने के दिन उत्सव मनाया जाता है जिसमें जाति पंचायत को भोज दिया जाता है, जिसमें शराब और मुर्गा विशेष तौर पर परोसे जाते हैं. जो ग्राहक सबसे अधिक पैसा देता है उसे ही उस लड़की को सौंप दिया जाता है. उस दिन से उस लड़की का धंधा शुरू हो जाता है. ग्राहकों का आना जाना शुरू हो जाता है एक दिन में 8 से 10 ग्राहक आते है षुरूआति समय में पैसा बहुत ज्यादा मिलता है. लेकिन जैसे जैसे समय के साथ उम्र बढ़ती जाती है धंधा कम होता जाता है. यानि ग्राहक कम उम्र की लड़कियों की ही माँग करता है. 13-14 साल की उम्र से शुरू हुआ धंधा 30 ये 35 साल तक आते आते कम और फिर बंद हो जाता है. मतलब धंधा उसे खुद ही बाहर कर देता है. 14 से 35 साल की उमर के बीच का जीवन यही लड़की का जीवन होता है उसके बाद उसे कोइ नहीं पुछता. धंधे के कारण उस लड़की को बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ता है. 

ग्राहकों में पैसे वाले व्यापारियों से लेकर नेता भी शामिल हैं. हाई-वे होने के चलते ट्रक ड्राइवर से लेकर कॉलेज के लड़के भी ग्राहक बनते हैं. क्योंकि इनके घर गाँव से बाहर डेरे में होते है जिसमें केवल बाछडा जाति के लोग ही बसे होते हैं तो हर समय धंधा चालू ही रहता है. घरों में ही ये काम होता है. परिवार, गाँव, पुलिस-प्रशासन, राजनेताओं और इस सभ्य समाज के सामने ही यह अमानवीय प्रथा चली आ रही है. ऐसा नहीं है कि इसे कानून से वैधता मिली हुई है. देह व्यापर गैरकानूनी है. कानुन द्वारा अपराध घोषित कर देने के बावजुद यह सब होता है और एक जाति विषेष की लड़कियों के मानवाधिकारों का खुला हनन होता रहता है.

एक लड़की जब नाबालिग होती है तभी से उसे इस काम में उतार दिया जाता है. इस नाते यह मामला बलात्कार का बनता है. शुरुआत में ऊँची कीमत चुकाने वाले ग्राहकों से सलीके से पेश आने की क्या उम्मीद की जा सकती है. उनका व्यवहार इन बच्चियों के प्रति वहशियाना होता है. मारपीट तक हो जाती है. ऊँची कीमत चुकाने वालों में जवान से लेकर बूढ़े व्यक्ति हो सकते हैं. ये रोज़ का सिलसिला बन जाता है. मासूम लडकियाँ बुरी तरह थक जाती हैं. मानसिक और शारीरिक पीड़ा से उबरने के लिए वह अक्सर शराब को विकल्प चुन लेती हैं और कई बार नशे की आदी हो जाती हैं.

एक दिन में कई ग्राहको के संर्पक में आने के कारण इन्हें कई तरह की यौन संक्रमण की बीमारियाँ भी लग जाती हैं. अनपढ़ता और जागरूकता की कमी के चलते बचाव की जानकारियाँ नहीं होती. हो भी तो ग्राहक की मर्ज़ी के अनुसार ही सब कुछ करना पड़ता है. कई बार अनचाहा गर्भ तक भी ठहर जाता है. ऐसे में या तो उस बच्चे को जन्म देना पड़ता है या फिर र्गभपात करवाना होता है. लेकिन दोनों ही स्थिति में लड़कियों के शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ता है. बच्चे को जन्म देने की स्थिति में उसे पालने की ज़िम्मेदारी भी लड़की के सिर आ जाती है.

[प्रतिकात्मक चित्र ]

देह-व्यापार से होने वाली कमाई पर भी अक्सर उस लड़की का हक नहीं होता क्योंकि वो पैसा उसके घर खर्च में उपयोग में लाया जाता है. जब लड़की की उम्र कम होती है तो कमाई थोड़ी अधिक होती है. जैसे जैसे उसकी उम्र बढ़ती है, कमाई कम होती जाती है जिसका उसके जीवन पर बुरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. घर का गुज़ारा मुश्किल से हो पाता है. दवाई, परिवार का पालन पोषण, पुलिस द्वारा दबिश करने पर उन्हें और जाति-पंचायत को रुपये-पैसे देने पड़ते हैं.

जाति-पंचायत इस काम को बढ़ावा देती है. जाति-पंचायत पुरूषों की ही होती है लेकिन गौर करने वाली बात है कि इस जाति की पहचान महिलाओं से, उनके काम से होती है. जाति-पंचायत के ढ़ांचे में हर गाँव में से एक पंच होता है. जिस भी गाँव का मामला होता है, पंच सक्रियता दिखाता है. पंचायत जाति के हर मामले पर र्कायवाही करती है. जो भी पंचायत बुलवाता है उसे शराब और मुर्गा-मास की व्यवस्था करना होती है और पंचायत का खर्चा अलग से देना होता है. कोई लड़की अपनी मर्जी से धंधे से बाहर नहीं आ सकती. पंचायत व्यवस्था को बनाए रखने का हर कार्य करती है. और पुलिस द्वारा दबिश करने पर पंचायत के लोग ही वहाँ मध्यस्थता करते है. “अनैतिक व्यापार प्रतिषेध कानुन” के तहत गिरफ्त में आईं मासुम नाबालिग लड़कियों का भला क्या कुसूर! उन्हें तो जिस उम्र में डाला गया है उसमें वो नाबालिग थी और उनकी अपनी इच्छा से तो वो नहीं गई हैं इस धंधे में. बल्कि उन्हें तो धंधे में धकेला गया है इस व्यवस्था के द्वारा. वे तो पीड़ित हैं ना कि अपराधी. और हमारा सभ्य समाज और पुलिस उन्हें अपराधी की तरह देखता है. इस जाति-व्यवस्था ने उन्हें ये काम दिया है. पुलिस और कानुन ने उस काम को अपराध कहा.

यहाँ टकराव पैदा होता है सामाजिक व्यवस्था और कानुन व अधिकारों के मध्य. अगर वे जातिगत काम छोड़ें तो आपका तथाकथित सभ्य समाज उसे स्वीकार नहीं करता. और यदि वे काम को करना जारी रखें तो कानुन उसे अपराधी समझता है. दोनों ही स्थितियाँ कोई हल नहीं सुझाती. दोनों ही तरफ से प्रताडना है. ये एक बहुत ही गहरा सवाल है.

यही नहीं अचानक से पुलिस का पहुँच जाना और उसे एक दबिश या रेड का नाम देना एक नाटक सा नजर आता है क्योंकि बाछडा जाति के गाँव चिन्हित हैं. उनका सर्वे हो रखा है. उन्हें बरसों हो गए अपने ठिकानों पर रहते रहते. डेरों के नाम, कहाँ कहाँ धंधा होता है, यह भी पहले से ही पता होता है लेकिन फिर भी ये नाटक होता है. इसका एक ही कारण है कि यह पुलिस और जाति-पंचायत के लिए एक कमाई का भी जरिया है. रेड के नाम पर पुलिस लड़कियों को उठा ले जाती है और उन पर र्कायवाही कर मामला दर्ज किया जाता है. फिर उनको जमानत करवाना पड़ती है. लेकिन ग्राहकों पर कोई कार्यवाही नहीं होती है. इन सब में ग्राहक बचके निकल जाता है. जमानत हो या लेन-देन कर मामला सुलझाना, दोनों ही स्थितियों में रूपये का इंतजाम वापिस धंधा करके ही हो पाता है. परिवार का पालन पोषण भी साथ ही साथ चलता रहता है.

हम योजनाओं की बात करें तो उनके वोट डालने के लिए वोटर आई. डी. तो होता है लेकिन दुसरी सामाजिक सुऱक्षा योजनाओं का लाभ नहीं मिलता है. उनकी स्थिति दयनीय होती है. काम तो होता है लेकिन आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं होता है. एक यह बात भी सामने आई कि उन्हीं ग्राहकों में से कोई एक जिनसे उसका भावनात्मक जुड़ाव होता है वे शादी भी कर लेते है. लेकिन शादी भी अक्सर ही एक छलावा साबित होती है. आम तौर पर कोई ग्राहक लड़की से शादी तो कर लेता है किंतु उसे अपने घर नहीं ले जाता है, और ना ही उस रिश्ते को समाज के सामने लाना चाहता है. इसकी वजह भी शायद यही है कि वह लड़की या औरत बिस्तर पर तो स्वीकार्य है पर समाज में नहीं. और ना ही उसे उसकी संपत्ति में या उससे जन्म लिए बच्चों को कोई हक मिलता है. कुछ समय के बाद अधिकतर पुरुष रिश्तों से परे चले ही जाते हैं. और वह लड़की फिर से अकेली पड़ जाती है. परिवार के नाम पे ठगी जाती है. शादी के नाम पर ठगी जाती है. असल में ना कोई उसका परिवार होता है ना ही कोई हमसफ़र. दरअसल ये इस सफ़र की ही विडंबना है. इस जाति के पुरुषों के बारे में बात करें तो कुछ तो काम करने बाहर चले जाते हैं. और कुछ वहीँ रहकर कुछ छोटा-मोटा काम करने लग जाते हैं. किंतु फिर भी परिवार का पालन-पोषण करने की ज़िम्मेदारी औरतों पर ही होती है. ज्यादातर आदमी नशा करते हैं. वे अगर काम करने भी जाएँ तो उन्हें भी बाछडा जाति का होने के चलते काम नहीं मिलता. जाति व्यवस्था का दंश हर दम उसे प्रताड़ित करता रहता है. जाति जो कभी नहीं जाती यह बात हर बार सत्य साबित होती चलती है. 30 से 35 साल की उम्र का धंधे वाला जीवन ख़त्म होने के बाद उसे सब छोड़ देते हैं. उसकी माँग समाप्त हो जाती है. हर कोई कम उम्र की लड़की की चाह रखता है. उम्र दराज महिलाओं को पैसा आना बंद हो जाता है. बीमारियाँ घेर लेती हैं. रोटी का सवाल हमेशा सामने खड़ा रहता है. नशे की आदत अलग से परेशान करती है. ये दौर सबसे बुरा दौर होता है जिसे भोगना एक मात्र विकल्प बचता है. एक मानसिक अवसाद से भरा जीवन एक रोज़ समाप्त हो जाता है.

एक नागरिक जिसके मानवाधिकारों का हनन सबके सामने होता रहता है. कोई जवाबदेह नहीं. किसी की जवाबदेही नहीं. ना सरकार ना समाज. ये एक ‘जनरल’ लड़की का जीवन नहीं बल्कि इस जाति में पैदा हुई उस हर लड़की जो धंधे में जाती है उसका जीवन है.

क्या ये काम छूट भी सकता है? क्या इस जाति में पैदा हुईं मासूम लड़कियों को इस दलदल में जाने से रोक सकते है? यह एक बड़ा सवाल है. एक ओर सामाजिक व्यवस्था है दूसरी ओर कानुन है. जबकि उन लड़कियों के मानव अधिकार और उनके सम्मानपुर्वक जीवन जीने का अधिकार हमारा भारतीय संविधान देता है. लेकिन ज़िंदगियाँ उसी ढर्रे पर चलने को मजबूर होती चली आ रही हैं. अबोध लडकियों को जबतक इस धंधे की ठीक से समझ आती है और वह इसे छोड़ना चाहती है तब तक काफी देर हो चुकी होती है. तब तक वे इस दलदल में धंस चुकी होती हैं.

ये सवाल इस सभ्य समाज से है क्योंकि इन मासुमों के देह भोगने की मांग भी इसी सभ्य समाज से आती है. अगर उन मासुमों की मांग आना बंद हो जाए तो शायद इस धंधे पर भी इसका असर आये और यह भी ख़त्म हो जाये. लेकिन ‘सभ्य’ समाज ऐसा करेगा? क्या यह जाति व्यवस्था खत्म हो सकती है? पढ़ा लिखा समाज भी यहाँ तो दलितों-पिछड़ों को तंग नज़रिय से देखता है. उनका शोषण करता है. आगे बढ़ने के मौके बनने नहीं देता. ऐसे में मुझे कुछ भले की उम्मीद उनसे नहीं है.

दूसरी ओर, व्यवस्था के खिलाफ जाना सामाजिक व्यवस्था को बदलना, इस व्यवस्था पर चोट करना इतना आसान नहीं है. सदियों से औरतों को दोयम दर्जे पर ही रखा गया है. भले ही उसके वोट की कीमत एक उच्च जाति के पुरूष और एक उच्च जाति की महिला के वोट के बराबर ही है, लेकिन अन्य जगहों पर स्थितियां भयानक रूप से अलग हैं. एक औरत होना और उसपर भी दलित वर्ग से होना… ऐसे में संघर्ष के रास्ते लंबे और संकरे होते चले जाते हैं. ये रस्ते अक्सर इन डेरों में फिर से घूमकर ले आते हैं इस जाति को. इस जाति की महिलाओं को.

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क्रांति खोड़े पिछले कई वर्षों से एक विषयगत नेता के रूप में महिलाओं पर होने वाली हिंसा के खिलाफ जन साहस के साथ काम कर रही हैं. उनसे kranti_k.jansahas@rediffmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

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