रचना गौतम (Rachna Gautam)

1. ओ री सखी !

ओ री सखी !
जब ढूँढते-ढूँढते पा जाओ
शोरिले से अक्षरों में मगरूर
वो चार पन्ने
और पढ़कर समझ आ जाए
गणित तुम्हें
इस दुनिया का
तो हैरान न होना
बेताब न होना
धीरज धरना
शुन्यता के खगोल में
कहीं मूक न हो जाएँ
तुम्हारी मास्पेशियों का बल
जीवन-चाल
स्वप्न तुम्हारे
बौद्ध तुम्हारा !

बौरा न जाना
आवेश में
न पूछने लग जाना-
    ये प्रेम नाम की कस्तूरी माथे पर लगाए
    युगों से जो तुम घूम रहे हो
    क्यों भला ?

ओ री सखी !
वो खूब जानते हैं
पन्ने पलटना
रद्द करना सब सहजता से
बस तुम्हें झूठा ठहराने को
ओ री सखी !
संयम रखना
चकित न होना
न प्राणहीन ही !

रो लेना जी भरकर तुम
फूट-फूटकर
बह जाने देना- भय दुःख, शोक जैसा सबकुछ!
गहरी एक साँस लेना
फिर पढ़ना सारे पन्ने तुम
धीरे धीरे
चार पन्ने वो-
   पितृसत्ता
   पूंजीवाद
   परंपरा
   और प्रेम के !

ओ री सखी !
सूर्य सी दमक वाली
कात्यानी से स्वर वाली, लड़की !
सीख लो 
सियासत-सी इक पर्देदारी
वायु के वेगों को अपने बालों में गूंदकर
मुस्कुराना
होंठों से आँखों तक !
हाँ लेकिन
गुप्त रखना ये अर्जित ज्ञान
भोलेपन में छुपा न लेना
ब्लाउज़ में
रूमानी रातों में निर्वस्त्र होते ही
पकड़े जाने का खतरा है
न छुपा लेना इसे
बटुए की किसी जेब में
बटुए की फितरत होती है
ज्ञान सारा निगल जाएगा
न सोचना
छुपाने की उन्हें
किताब के पन्नों के बीच कहीं
वो किताबें दरअसल तुम्हारी
कभी थीं ही नहीं !

चाहे तो छुपा आना तुम
ज्ञान अपना
उसी जगह जहाँ खोजा था
इस रात और निर्मम धुप से परे कभी
गर निकलोगी कभी तुम
पढ़ लेंगे वो तुम्हारे चेहरे की इबारत
भांप लेंगे
विद्रोही स्वर
तुम नज़र चुराके सबसे
चाहे थमा आना
रहस्यमय ये चार पन्ने
अपनी किसी सखी को !

फिर देखना
उसकी ओर
प्रेम, विश्वास, सहानुभूति की नई एक दृष्टि से
ऐसी दृष्टि
नज़र पड़े जब उसकी तुमपर
महसूस करे वो
तुम्हारे भीतर समाई
असीम चेतना और शक्ति !

2. दलित स्त्रियाँ कहाँ प्यार करती हैं ?

दलित स्त्रियाँ
कहाँ प्यार करती हैं ?
नहीं, वो प्यार नहीं करतीं हैं !

सावली सी चमड़ी
उस पर खिंची अनंत रेखाएं
सख्त हाथों की खुश्की
पीली पड़ी सफेदी
सुंदरता के
तथाकथित पैमाने पर
कब चढ़ती हैं
कि किसी पुरूष की आँखों में ठहर जाए
हसीं सा इक सपना बनके
खिल जाएं
ऐसा श्रृंगार ही वो कब हैं करतीं
दलित महिलाएं?
नहीं नहीं
वो प्यार नहीं करती हैं !

सुना है पवित्रता-अपवित्रता के रंग
पितसत्ता में जब घुलते हैं
तब ही खूब उभरते हैं
तब ही तो माँ लाडलों को अपने
सिखा-पढ़ाकर भेजती हैं बाहर-
दलित स्त्री संग प्रेम में पड़ना
बिगड़ जाना है
‘वो’ खानदान का सर्वनाश हैं करतीं
ख्याल रखना !

जिन घरों की ओखल में
कुचले जाते है
विघाती शब्दों के मूसल से
दलित स्त्रियों का
अस्तित्व
अरमान
स्वाभिमान उनका नित ही
ऐसे में प्रवेश द्वार नहीं ही है करतीं !

दलित स्त्रियाँ ?
नहीं
दलित स्त्रियाँ प्यार नहीं करती !

~~~

 

रचना गौतम, सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं। कविताओं, ग़ज़लों में व अवलोकन कर विवेचना करने में रुचि रखती हैं।

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