‘पठान’ के पर्दे में क्या-क्या छिपा है?

अरविंद शेष (Arvind Shesh) ‘पठान’ फिल्म शुरू ही होती है कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म होने की खबर पर पाकिस्तानी सत्ता तंत्र के भीतर भारत के खिलाफ नफरत और दुश्मनी के सीन के साथ। इतने से यह समझ लेना चाहिए कि यह फिल्म क्या है। लेकिन चूँकि औसत और शासित दिमागों को थोड़ा मसाज-सुख देना था, इसलिए रॉ (RAW) से […]

मैं तुम्हारा कवि नहीं हूँ…

Vidyasagar

विद्यासागर (Vidyasagar) मैं तुम्हारा कवि नहीं हूँमैं कवि हूँ अपने चमारटोली काजिसकी दुर्गन्धता में तुम्हें नरक का आभास होता हैलेकिन मुझे उसमे समानता का स्वर्ग प्रतीत होता है। मैं कवि हूँ उन लाखों लोहारों काजिनकी निहाई पर बरसते हथौड़ों की आवाज़ मुझे तुम्हारे मंदिरों में चीखते घंटों से ज्यादा मधुर लगती हैं। मैं कवि हूँ उन लाखों डोमों काजिनकी छाया […]

कवि कृष्णचंद्र रोहणा की रचनाओं में सामाजिक न्याय एवं जाति विमर्श

Deepak Mevati

डॉ. दीपक मेवाती (Dr. Deepak Mewati) सामाजिक न्याय सभी मनुष्यों को समान मानने पर आधारित है। इसके अनुसार किसी भी व्यक्ति के साथ सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक आधार पर किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। मानव के विकास में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं की जानी चाहिए। सामाजिक न्याय की अवधारणा का अर्थ भारतीय समाज […]

मध्यकालीन अशराफ़ इतिहास और पसमांदा सवाल

लेखक : अब्दुल्लाह मंसूर (Abdullah Mansoor) हम यह जानते हैं कि पसमांदा मुसलमानों का न कोई राज्य रहा है और न कोई राजा। क़ौम के बनाए ढाँचे में पसमांदा मुसलमान तब तक फिट नहीं हुए जब तक लोकतंत्र में प्रत्येक वोट का महत्व नहीं बढ़ा। विदेशी नस्ल के मुस्लिम सुल्तानों और बादशाहों ने भारतीय पसमांदा समाज को कभी अपने बराबर […]

आंबेडकरवाद क्यों जरूरी है?

संजय श्रमण (Sanjay Shraman) डॉक्टर अंबेडकर ने कहा है कि भारत का इतिहास असल में श्रमण और ब्राह्मण संस्कृति के संघर्ष का इतिहास है। इस बात को धार्मिक-दार्शनिक विकास सहित परंपराओं, कर्मकांडों, देवी-देवताओं के विकास के स्तर पर भी बहुत दूर तक समझा जा सकता है। ना केवल भौतिक संसाधनों की लूट एवं अधिकार के लिए संघर्ष के संदर्भ में […]

पानी की लड़की और नीला रंग (कविताएँ)

उमा सैनी (Uma Saini) पानी की लड़की और नीला रंग माँ !तुम्हारे आँसुओं के समन्दर से बनीमैं पानी की लड़कीजो हर छोटे दुख पर भीग जाया करती हूँ।वर्षों तक तुमने जो विष पियाउसके नीले थक्के जब तुम्हारी देह पर देखे मैंनेतब जाना की क्यों नीला होता है समन्दर !तुम्हारी देह के नीले थक्के मुझे अपनी देह परक्यों महसूस होते हैं?क्या […]

पीऍफ़आई (PFI) पर लगे प्रतिबन्ध पर पसमांदा प्रतिक्रिया

इस सवाल का जवाब तो देना होगा न कि मुसलमानों का 85% पसमांदा समाज आज अगर गलाज़त में जी रहा है तो कसूरवार कौन है? सरकार को तो हम जी भर के गालियां देते ही हैं पर अब हमें अशराफ मुस्लिम रहनुमाओं से सवाल करने होंगे। हमारे मुसलिम समाज के धार्मिक और राजनीतिक रहनुमाओं ने कौन-सी रणनीति बनाई है जिस पर चल कर यह समाज अपनी गलाज़त से निकल सके? शिक्षा और रोज़गार क्या हमारी मुस्लिम राजनीति का हिस्सा है भी? ये समस्याएँ आखिर कभी राष्ट्रीय बहस का हिस्सा क्यों नहीं बन पाती हैं? तलाक के मुद्दे पर तो सड़कें भर देने वाले हमारे धार्मिक रहनुमा क्या इन मुद्दों पर कभी सड़कों पर निकले हैं? हिंदुत्व (फासिस्ट ताकतों) को मुसलमानों का सबसे बड़ा खतरा बताने वाले हमारे रहनुमाओं ने उससे लड़ने के लिए कौन-सी लोकतांत्रिक रणनीति समाज को दी है? कैसे हम इस खतरे का मुकाबला करें? क्या कोई तरीका है मुसलिम समाज के पास?

जहाँ कभी एक गाँव हुआ करता था…

वहीदा परवेज़ (Wahida Parveez) (1)इक ख्वाब के नक़्शे-कदम मैंने अपना पेट फुला हुआ महसूस किया ! दरअसलमैं हर चीज़ महसूस कर पा रही थी ! मैं अपने बचपन में थी नानी के गाँव वाले टूटे-फूटे रास्ते से चलते-कूदते मैंने पानी का टपकना महसूस कियामैं रोते-रोते घर पहुँचीमैंने सबसे कहा- वह बस आने वाला है !मैंने अपनी नाभि के नीचे उसे […]

मेरे हाथ में कलम है…

करुणा (Karuna) 1इतिहास हमारा छीन कर कब तक मौज मनाओगे वीर गाथा दबा कर हमारी शेर तो ना बन जाओगेधूर्त ही कहलाओगे मेरे हाथ में कलम है जो अब उसने चलना सीख लिया है इतिहास की परतें खोल रही हूँ मैंने खोजी होना सीख लिया है काफी कुछ तो ढूँढ लिया है बहुत कुछ मगर अभी है बाकि झूठी शानो-शौकत […]

भारतीय सिनेमा के पसमांदा सवाल

अब्दुल्लाह मंसूर (Abdullah Mansoor) एक लंबे दौर तक भारतीय सिनेमा जाति और जातिगत समस्याओं की न केवल अनदेखी करता रहा है बल्कि भीषण जातिगत वास्तविकताओं को अमीर बनाम गरीब (कम्युनिस्ट नज़रिये) की परत चढ़ा कर परोसता रहा है। दलित सिनेमा की कोशिशों से ये परत साल दर साल धूमिल पड़ती जा रही है और इस प्रयास में 2021 दलित सिनेमा […]