भारतीय सिनेमा के पसमांदा सवाल

अब्दुल्लाह मंसूर (Abdullah Mansoor) एक लंबे दौर तक भारतीय सिनेमा जाति और जातिगत समस्याओं की न केवल अनदेखी करता रहा है बल्कि भीषण जातिगत वास्तविकताओं को अमीर बनाम गरीब (कम्युनिस्ट नज़रिये) की परत चढ़ा कर परोसता रहा है। दलित सिनेमा की कोशिशों से ये परत साल दर साल धूमिल पड़ती जा रही है और इस प्रयास में 2021 दलित सिनेमा […]

भारत के शहरी निजी क्षेत्र में जातिगत भेदभाव

प्रीति चंद्रकुमार पाटिल (Preeti Chandrakumar Patil) सुखदेव थोरात और कैथरीन न्यूमन ने अपने लेख ‘जाति और आर्थिक भेदभाव: कारण, परिणाम और उपाय’ (कास्ट एंड इकनोमिक डिस्क्रिमिनेशन: कॉसेस, काँसेकुएन्सेस एंड रेमेडीज) में सामाजिक बहिष्कार को एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया है जिसके द्वारा कुछ समूहों को सामाजिक सदस्यता निर्धारित करने वाली आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक संस्थाओं में प्रवेश […]

मुझे प्यार करती, ऐ पर-जात लड़की…

(1) गैर विद्रोही कविता की तलाश मुझे गैर विद्रोहीकविता की तलाश हैताकि मुझे कोई दोस्तमिल सके।मैं अपनी सोच के नाखूनकाटना चाहता हूँताकि मुझे कोईदोस्त मिल सके।मैं और वहसदा के लिए घुलमिल जायें।पर कोई विषयगैर विद्रोही नहीं मिलताताकि मुझे कोई दोस्त मिल सके। (2) ये रास्तेधरती और मंगल के नहींजिन्हें राकेट नाप सकते हैंना ये रास्ते दिल्ली और मास्को या वाशिंगटन […]

उत्तर प्रदेश में ‘मौन क्रांति’ का क्या हुआ?

निर्बन रे और ओम प्रकाश महतो (Nirban Ray & Om Prakash Mahato) मुख्य रूप से दो दृष्टिकोण ही चलन में रहे हैं जिनके द्वारा सामान्य रूप से उत्तर भारत और विशेष रूप से उत्तर प्रदेश की राजनीति का विश्लेषण किया जाता है। ये दो दृष्टिकोण या विश्लेषण, हालांकि विभिन्न पद्धतियों या विविध केस-स्टडीज़ (मामले के अध्यनों) पर आधारित हैं, इनका […]

मैं जब भी देखती हूँ…

करुणा (Karuna) (1) मैं जब भी देखती हूँ मेरेमैं जब भी देखती हूँ मेरे समाज की किसी महिला कोसिर पर उपले उठाकर ले जाते हुए मुझे रमाई याद आती है मैं जब भी देखती हूँ किसी महिला को खेतों में धान रोपते या काटते हुए मैं जब भी देखती हूँ मेरी माँ को किफ़ायत में घर को चलाते हुए संकोच […]

शैक्षणिक संस्थानों में प्रशासनिक अकर्मण्यता: प्रावधान और अनुपालन

राघवेंद्र यादव (Raghavendra Yadav) जैसा कि यह सर्वविदित है कि अतीत में हुए सामाजिक अन्याय व भेदभाव से उपजे गैर बराबरी को मिटाने के लिए संविधान प्रदत्त अधिकार सही तरह से जमीनी स्तर पर इम्प्लीमेंट (अमल) नहीं हो पायें हैं। आज आज़ाद भारत आठवें दशक के पूर्वार्द्ध में है लेकिन हैरत की बात है कि आज तक सरकारें और स्वायत्त […]

आक्रामकता, हिंदुत्व और ‘मोदी लहर’ का सच बनाम अखिलेश यादव की राजनीति

Devi Prasad HCU

देवी प्रसाद (Devi Prasad) भाजपा की स्थापना 6 अप्रैल 1980 में हुई थी. यह वही दौर था, जब मंडल कमीशन ने 27 प्रतिशत आरक्षण पिछड़े वर्ग यानि देश की लगभग आधी आबादी को सामाजिक न्याय देने का सुझाव दिया था. हालांकि, ‘सॉफ्ट’ हिंदुत्वा’ की राह पर चलने वाली कांग्रेस ने कमंडल के डर से एक दशक तक मंडल कमीशन की […]

रिक एंड मोर्टी: सृष्टि, विज्ञान और इंसान (वेबसीरिज़ समीक्षा)

लेनिन मौदूदी (Lenin Maududi) रिक एंड मोर्टी (Rick and Morty) एक अमेरिकी सिटकॉम (sitcom) है जिस को जस्टिन रोइलैंड (Justin Roiland) और डेन हारमॉन (Dan Harmon) ने बनाया है। 2013 से अब तक इसके पाँच दौर यानि सीज़नस (seasons) आ चुके हैं। पहली नज़र में यह सीरीज़ आप को बच्चों का कोई आम सा कार्टून नज़र आएगी पर यक़ीन करें […]

डोन्ट लुक अप’: धारणा निर्माण का एक और खेला

अरविंद शेष (Arvind Shesh) ‘डोन्ट लुक अप’ भी सुर्खियों में है। जो दौर चल रहा है, उसमें जो भी चीज सुर्खियों में हो, उस पर एक बार तो शक कर ही लेना चाहिए! दिमाग के ‘डिटॉक्सिफिकेशन’ (अंग्रेजी का एक शब्द जिसका अर्थ है गलत खानपान की वजह से शरीर में बन गए ज़हरीले तत्वों को निष्क्रिय करने के लिए लिए […]

सावित्री बाई फुले को उनके 191वें जन्मदिन पर याद करते हुए

डॉ सूर्या बाली “सूरज धुर्वे” (Dr. Suraj Bali ‘Suraj Dhurvey’) शिक्षा के महत्त्व को सावित्री बाई फुले ने जितनी व्यापकता से समझा उसकी मिसाल उनके पूरे जीवन में उनके द्वारा किये बाकमाल कार्यों से मिलती है. शिक्षा के ऐसे महत्त्व में उनके अपने निजी जीवन शिक्षा के चलते आये ज़बरदस्त परिवर्तन की छाप भी है. ये बात अब उनके समझ […]