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इसके या उसके ही नहीं, ‘कबीर’ सबके हैं

शैली किरण (Shelly Kiran)

सुकरात ने एक बार कड़े स्वर में पूछा था- आप किस तरह मुझसे इस नगर के लिए उपचार की उम्मीद रखते हैं? क्या मुझे एंथेन वासियों से तब तक लड़ना चाहिए जब तक वे सुधर न जायें जैसे कि किसी चिकत्सक ने उन्हें सुधारा हो या फिर मैं उनका सेवक बन जाऊँ और उनका मनोरंजन करूँ?

सुकरात के इस कथन को कबीर जी के हवाले से यहाँ के लोक-समाज के दरपेश रखकर देखा सकता है. अमरीका की एक कबीर-प्रेमी लिंडा हेस कबीर की तुलना सुकरात से करते हुए अपनी किताब ‘द बीजक ऑफ़ कबीर’ में इसी वाकया का हवाला देती है. बहरहाल, इससे यह समझा जा सकता है कि पश्चिम ने कबीर को काफी महत्व दिया है. हालाँकि कबीर अपने जीवन-दर्शन में एक ऐसी हस्ती को प्राप्त होते हैं जिससे दरअसल, यहाँ के इतिहास को खुद पर गर्व करना चाहिए. ब्राह्मणवाद की गर्त में धसे और बराबरी से दूर विचरते समाज के लिए कबीर उजाला सरीखी हैं. जाति अहम् को किनारे कर जिस कबीर तक हम पहुँचते हैं वह अतुलनीय हैं, जिनकी तुलना किसी से भी करने की कोई ख़ास आवश्यकता बचती नहीं.

दूसरी ओर, जबकि यह भी सच है कि भारतीय लेखक-जगत और समाज कबीर को दायरे में बाँध कर देखता है. जो लोग जीते जी उनके प्राण लेने को उत्सुक थे वे मरने के बाद उन्हें जाति धर्म के खांचों में बाँध कर उनकी वैचारिक हत्या करते आये हैं. वे उन्हें एक विधवा ब्राह्मणी का पुत्र कहते हैं, मानो शोषित और नीच समझे जाने वाले तबके के घर प्रतिभा पैदा ही नहीं हो सकती.

कबीर की निरपेक्षता और ईमानदारी को रह्स्यवादी कहकर हिंदी आलोचक उनसे छुटकारा पा लेते हैं. लेकिन कबीर इतने जटिल और रहस्यवादी होते तो लोक-गीत और परंपरा में नहीं गाये जाते. पंजाबी, राजस्थानी, भोजपुरी, बंगाली तक में जन-जन की ज़ुबान पर पहुंचे कबीर दार्शनिक और आधुनिक दर्शन के प्रणेता हैं.

उनकी संवाद शैली ‘कहत कबीर सुनो भई साधो/संतो/भाई’ आधुनिक साहित्य के अधिक करीब है. कबीर अन्य पुरातन कवियों की तरह जो बिम्ब चुनते हैं वह प्रकृति या जीवों से नहीं चुनते अपितु मनुष्य को सीधे संबोधित करते हैं! नाथन उन्हें श्रोता के बहुत करीब पाते हैं जैसे एक सच्चे अध्यापक और दार्शनिक को होना चाहिए.

कबीर खुद को जुलाहा संबोधित करते हैं और इसी को उनकी पहचान माना जाना चाहिए. कई आलोचक उन्हें कृषक या दलित कहकर ओ बी सी और दलित जाति का विवाद खड़ा करते हैं जबकि जिस समय कबीर का जन्म हुआ (1398) उस समय धरती के इस हिस्से पर ओबीसी या दलित जैसे वर्ग नहीं थे. शूद्र थे जो नीच ही समझे जाते थे.

संत कबीर

हिन्दू मुस्लिम विवाद से भी कबीर परे हैं “हिंदुअन की हिन्दुआई देखि तुरकन की तुरकाई’’ कहने वाले कबीर को हिन्दू और मुस्लिम दोनों बराबर मानते थे. उन्होंने बाकयदा दोनों धर्मों के लोगों को शिक्षित-दीक्षित किया. जिस समय कबीर का जन्म हुआ हिन्दू धर्म के शोषित लोग मुस्लिम धर्म में परिवर्तित हो रहे थे. ‘शुकल’ जी तो उन्हें बौद्ध और नाथ परंपरा से प्रभावित बताते हैं. और गुरु ग्रन्थ साहिब में तो उन्हें पूर्ण सम्मानजनक स्थान मिला है. वास्तव में इस तरह कबीर इकलौते दार्शनिक ठहरते हैं जो भारत के लगभग समस्त शोषितों का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं.

कबीर की बात करते हुए उन्हे भक्ति साहित्य में रखते हुए ‘भक्त कबीर’, ‘संत कबीर’ और कई कई नामों से संबोधित किया जाता है. कंबीरपंथी उन्हें ‘बाबा कबीर’ या ’साहेब कबीर’  कहकर बुलाते हैं. कबीर की रचनाओं से अधिक बात उनकी जाति और उनके धर्म को लेकर होती है. उनका मकबरा उनके पुत्र कमाल का मकबरा मगहर में है फिर भी उनकी जातिगत पहचान को लेकर सवाल उठाए जाते हैं! वे जब खुद को बार-बार जुलाहा कहते हैं और धार्मिक पाखंडों की आलोचना करते हैं तो उन्हें किसी और वर्ग में बांटना कबीर के साथ ही धोखा करना है. याद रखने योग्य बात है कि उनके शिष्य धरमदास बनिया जाति से संबंध रखते थे.

एक बड़ी अजीबो-गरीब स्थिति पैदा होती है जब दलित और ओबीसी भी कबीर को लेकर आपस में उलझते हैं जबकि देश के अधिकांश राज्यों में इस कृषक जाति को दलित माना जाता है. सबसे वैज्ञानिक चेतना से संबंधित बात तो यह होती कि कबीर जो कभी जाति की पीड़ा से प्रताड़ित रहे हैं और जाति प्रथा का विरोध करते हैं, तो वह ऐसा एक हिंदू या मुस्लिम नहीं बल्कि एक शूद्र के रूप में करते हैं. ओबीसी और दलित का विभाजन स्वतंत्रता के बाद में हुआ है और यह बात कारण से परे हैं कि कुछ कृषक जातियां कुछ राज्यों में शूद्र और कुछ में ओबीसी कैसे हैं? जबकि सभी सेवा करने वाले अर्थात काम करने वाले लोगों का वर्ण शूद्र ही था. इसी शूद्र की लड़ाई रविदास, कबीर, भीमराव आम्बेडकर महात्मा फुले, सावित्रीबाई फुले समेत कई महामानव एक सोच के अनुसार लड़े थे. यह एक प्रमाणिक सत्य है.

यह अन्यास नहीं है कि इस सब के पीछे कबीर के भीतर जो क्रांति की लौ जग रही थी उसे बुझाने का प्रयास चलता रहता है. यह माना जाता है कि कबीर का जन्म 1398 में हुआ और उनकी मृत्यु 1575 में हुई. कबीर के लिखे काव्य को सबसे पहले लोगों ने ‘आदि ग्रंथ’ के माध्यम से जाना. आदि ग्रंथ में जोकि 1604 ईस्वी में लिखा गया, कबीर के 227 पद गुरु ग्रंथ साहिब के द्वारा संकलित हैं जो सत्रह रागों पर आधारित हैं. 237 श्लोक हैं. सबसे पहले इन्हें गुरु नानक देव जी ने इकट्ठा किया और फिर गुरु अर्जुन देव जी ने इन्हें एक जगह संग्रहित किया. यह सब श्लोक और पद पंजाबी भाषा में संकलित हैं. गुरुमुखी पंजाबी की लिपि है उसी में इन्हें लिखा गया है.

बीजक में भी कबीर का साहित्य संकलित किया गया है. जैसा कि हम सब जानते हैं इसमें 400 साखियां हैं. फिर भी आदि ग्रंथ का 2/3 हिस्सा उस से मिलता जुलता है.

इसके अतिरिक्त हिंदी, कश्मीरी, फारसी और अरबी भाषा के अतिरिक्त कबीर के काव्य में जिनका संग्रह बीजक में है {कविता नंबर 91] में संस्कृत भाषा का भी मिलता है.

कबीर के काव्य इतना रहस्यवादी और दो अलग-अलग विचारधाराओं को साथ लेकर चलने वाला कैसे बना? इसका जवाब हमें कबीर के शिष्यों के बारे में जानने से मिलेगा.

जैसे गुरु ग्रंथ साहिब में गुरु नानक देव जी को संबोधित करके या उनके द्वारा संबोधन से कई पद उनके बाद भी प्रचलित हैं उसी प्रकार कबीर की वाणी को केवल कबीर ने नहीं उनके बाद हुए शिष्य और कबीर पंथ के अनुयायियों और गुरुओं ने भी जोड़ा है. उदाहरण के लिए ‘सुख निधान’ जिसे 18वीं शताब्दी के मध्य में लिखा गया. ‘गुरु महात्मा’ जिसमें ढाई सौ पद हैं जिससे धर्मदास जो कि कबीर के शिष्य माने जाते हैं उनकी चौथी पीढ़ी के प्रभु दास का वर्णन है’ इसी प्रकार ‘गोरखनाथ की गोष्ठी’ की कल्पना की गई है जिसका संपादन विल्सन ने किया है और प्रकाशन 18वीं शताब्दी में हुआ है. इसमें 150 दोहे हैं. इसी प्रकार ‘अमर मूल’  जिसे 18वीं शताब्दी में लिखा गया है, इसमें 5000 दोहे हैं. इसमें भी कबीर और धर्मदास के बीच बातचीत का वर्णन है जबकि इसे धर्मदास की आठवीं पीढ़ी द्वारा लिखा गया है. ‘कबीर वाणी’ में 1500 चौपाईयाँ और साखियां हैं. इसे 1790 में लिखा गया. इसमें हिंदी के साथ फारसी के शब्दों का प्रयोग है.

‘रेखता’ में भी कवितायेँ हैं, ‘बाबा संतोष बोध’ में 200 पद हैं, चौपाईयाँ, दोहे और साखियाँ हैं. इसी प्रकार ‘मुक्ति मोल’ में भी कबीर और धर्मदास की बातचीत है. ‘वेद सार’ में ढाई सौ दोहे हैं. ‘पृथ्वी खंड’ में कबीर धर्म के बारे में 300 पद हैं. आधिभेद, जन श्रोध, कर्म बोध, निरंजनबोध के साथ मुक्तिबोध (400 दोहे) है. निरंजन बोध में निर्गुण ईश्वर का ध्यान करते हुए 200 दोहे हैं.

‘अनुराग सागर’ में सबसे अचंभित करने वाली बात है कि कबीर और धर्मदास की वेदांत पर चर्चा है. इसे 1903 में प्रकाशित किया गया और इसके प्रकाशक गोरखपुर से नंदलाल नंदकुमार लाल है. ‘समाधि का टीका’ 1908 में प्रकाशित हुई जिसे महंत पुरुषोत्तम ने प्रकाशित करवाया. इसमें भी कबीर और धरमदास में बातचीत है.

‘जन प्रकाश’ को वैरागी महा दास ने 1908 में प्रकाशित करवाया था. जीव धर्म बौद्ध को परमानन्द दास ने 1887 में प्रकाशित करवाया जिसमें 300 दोहे व् चौपाइयाँ हैं.

कबीर और धर्मदास की बातचीत कबीरपंथियों में काव्य रूढ़ी के रूप में स्थापित हो गई जिसे कबीर का नाम होने के कारण उन्हीं (कबीर) के द्वारा रचित समझ लिया गया.

कबीर के जन्म का काल वह काल है जब दिल्ली मोहम्मद बिन तुगलक (1325 से 1351) के कारण लोगबाग अकाल, गरीबी एंव दुख से गुजर रहे थे. तैमूर भी 1398 में भारत आया. सुल्तान सिकंदर गाज़ी जिसे सिकंदर लोधी भी कहा जाता है और जिसका राज्य 1492 से 1517 तक रहा, कबीर के समकालीन हैं. शेख तरबी भी जोकि सूफी सोहरवादी संप्रदाय से संबंध रखते थे जिनकी मृत्यु 1429 में हुई, कबीर के समकालीन थे.

1887 में परमानंद दास (फिरोजपुर से) ने और 1903 में हिंदी में कबीर को मंसूर से मिलता-जुलता बताया गया है. कबीर के उन दोहों में जो उनके नहीं थे लेकिन कबीर के नाम से प्रचलित हुए उनमें शराब और मांस पर ज्ञान है. चारों वर्णों का वर्णन है. वेद और जैन धर्म की मीमांसा है. इस्लाम का वर्णन है. यहाँ तक कि गोरों तक का वर्णन है. परमानंद दास लिखित किताब में तो ब्रह्मा को और मनु को नोह तक कहा गया है. इसी प्रकार मोहम्मद, बौद्ध, जैन धर्मबोध, कबीर कसौटी जैसा ना ना प्रकार का साहित्य कबीर के नाम पर प्रचलित है.

बातचीत की भाषा में प्रचलित कबीर की 341 कविताओं का संकलन क्षितिज मोहन सेन ने भी तैयार करवाया जिनमें से केवल 59 बीजक हैं जो आदि-ग्रंथ में भी मिलती-जुलती हैं. 18 कविताएं और 39 साखियां बीजक से ली गई है. इसी में कविता नंबर 91 मैं ऐसे लगता है कि कबीर संस्कृत के ज्ञाता हैं जबकि उनकी पैरवी करने वाले सब जानते हैं कि वे संस्कृत नहीं जानते थे. रविंद्र नाथ टैगोर और कुमारी अंडरहिल ने इसका अंग्रेजी अनुवाद किया है जो कि मैकमिलन प्रकाशन से किताब की शक्ल में प्रकाशित हुई थी.

अहमद शाह का इस बारे में बड़ी साफगोई से मानना है यह कई कवियों का काम है. कई कवियों का काम कबीर के नाम को लेकर उनकी शैली में रचा गया इसलिए स्पष्टवादी कबीर रह्सयवादी और गूढ़ प्रतीत होते हैं जबकि वे स्पष्ट रूप से क्रांतिकारी और वर्ण व्यवस्था विरोधी कवि रहे हैं. उनका दर्शन समस्त विश्व के कल्याण और एकता का दर्शन है. शोषित वर्गों को उनके नाम पर लड़ने की नहीं बल्कि कबीर के उस दर्शन जिसमें वह वर्ण व्यवस्था पर चोट करते हैं; उस व्यक्ति को सूरमा कहते हैं जो अपने दीनो-ईमान की रौशनी में लड़ता है लेकिन कभी पीठ नहीं दिखाता, उसपर एकजुटता व् साफगोई से पहरा दिए जाने की आवश्यकता है. मेहनत करके कमाने और जीवन निबाह करने वाले, कुदरत के नियमों से संचालित होती ज़िन्दगी वाले, ज़ुल्म के खिलाफ स्पष्टता से तर्क करते हुए कबीर को खुली आँखों और गहरे चिंतन से रूबरू होने की बात ही असली बात है. बहुजनों को इसी बात को समझने की सबसे अधिक आवश्यकता है.

‘मै कहता हौं आँखन देखी, तू कहता कागद की लेखी, मै कहता सुरझावन हारी, तू राख्यो अरुझाई रे’

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संदर्भ

कबीर एंड हिज फल्लोवेर्स लेखक ऍफ़ ई के, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस (1931)

द बीजक ऑफ़ कबीर: लेखक लिंडा हेंज और सुखदेओ सिंह, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस (2002)

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शैली किरण हिमाचल प्रदेश से हैं. शैली अम्बेडकरवादी दृष्टिकोण से पंजाबी, हिंदी, अंग्रेजी, हिमाचली भाषाओँ में लेखन करती हैं व् एक जानीमानी कवि हैं.

One thought on “इसके या उसके ही नहीं, ‘कबीर’ सबके हैं”

  1. बहुत सटीक विश्लेषण
    बहुत बहुत साधुवाद जी

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